शतरंज की बिसात
शतरंज की बिसात
खेल कर किसी की भावनाओं के साथ,
खुद को बड़ा शातिर खिलाड़ी समझ बैठे हैं,
और फिर गलतफहमी की इंतेहा तो देखिये,
केवल वो ही खेल रहे हैं बेफिक्र ये मान बैठे हैं ..!!
जीवन के खेल में ज्यादा दिन चलती नहीं हैं चालाकियॉं,
एक ना एक दिन याद दिला दी जाती हैं कारस्तानियॉं,
घूम कर वही चाल जब खुद पर खेला जाता है,
फिर वो कारण पू़छता बेहाल नज़र आता है..!!
ये दुनिया शतरंज की बिसात पर बिछी बाजी है,
चाल चल रहे ऊंट घोड़ा पैदल राजा और हाथी है,
सारी बाजी पलट जाती है रानी के कदम बढ़ाते ही,
उसके मुट्ठी में बंद सारे प्यादों की इकलौती चाभी है ..!!
हर खेलने वाला खेल रहा है खुद को शातिर समझकर,
नादान यहॉं कोई नहीं है बस बैठा है वो ऑंख मूंदकर,
कोई यहॉं चालाक बहुत है समझे बैठा सबको कमतर,
जब चलेगा चाल वो कमतर हालात हो जायेंगे बदतर..!!
जीवन एक सरल सरिता सी बहती जाये ये हो निश्छल,
जीना उसका ही जीना है जो मदद करे औरों की बढ़कर,
साथ साथ मिल कदम बढ़ायें तो जीवन बनता खुशहाल,
सांझ सवेरे खेल खेलते चौपाल पर स्वस्थ नौनिहाल..!!
