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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत - २१८ ; वेणुगीत

श्रीमद्भागवत - २१८ ; वेणुगीत

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

वृन्दावन सुंदर लगे शरद ऋतु में 

श्री कृष्ण ने प्रवेश किया इस वन में 

गौओं और ग्वालबालों के साथ में। 


बांसुरी पर मधुर तान छेड़ दी 

और सुनकर इस वंशीध्वनि को 

गोपिओं का ह्रदय प्रेम से 

परिपूर्ण हो रहा और वो। 


वंशी का स्मरण करते ही 

मधुर चेष्टाओं का कृष्ण की 

प्रेमपूर्ण चितवन, भौओं के 

इशारे और मधुर मुस्कान को उनकी। 


बार बार याद करने लगीं और 

मिलने की आकांक्षा और बढ़ गयी 

मन हाथ से निकल गया उनका 

मन ही मन वहां पहुँच गयीं। 


जहाँ कृष्ण ग्वालों के संग 

वृन्दावन में प्रवेश कर रहे 

सिर पर मयूर पिच्छ है 

मन ही मन देखें वो ये। 


कनेर के पीले पुष्प कानों में 

शरीर पर पीताम्बर सुनहरा

गले में पांच प्रकार के 

पुष्पों की वैजन्ती माला। 


बांसुरी के छिद्रों को अपने 

अधरामृत से भर रहे वो 

वृन्दावन उनके चरणचिन्हों से 

हो गया रमणीय और भी वो। 


जड़, चेतन समस्त भूतों का 

मन चुराते वे वंशीध्वनि से 

गोपिओं ने उसे सुना तो 

उसका वर्णन करने लगीं वे। 


वर्णन करने में तन्मय होकर 

श्री कृष्ण का आलिंगन करने लगीं 

मुग्ध हो गयीं उसकी धुन में 

वो आपस में ये कहने लगीं। 


श्यामसुंदर कृष्ण हमारे और 

गोरसुन्दर बलराम जी हैं जो 

ग्वालबालों संग वन में जाएं 

या व्रज में वापिस आ रहे वो। 


अधरों पर मुरली धर रखी हो 

या प्रेम भरी चितवन से देख रहे 

सफलता हमारी आँखों की कि उनकी 

मुख माधुरी का पान कर रहे। 


फूलों के गुच्छे, कमल की माला 

या धारण करें मोर पंख जब 

कृष्ण के शरीर पर पीतांबर या 

नीलांबर फहराए बलराम पर जब। 


ग्वालबालों की गोष्ठी में दोनों 

मधुर संगीत की तान छेड़ दें 

दो चतुर नट अभिनय कर रहे 

रंगमंच पर, जान पड़ता ये। 


वैकुण्ठलोक तक विस्तार कर रहा 

अपनी कीर्ति वृन्दावन ये 

क्योंकि चरणकमलों से चिन्हित 

हो रहा यशोदानंदन के। 


मुनिजनमोहिणी मुरली बजाते 

जब श्री कृष्ण हैं अपनी 

मोर तब नाचने लगते 

मतवाले होकर तान पर उसकी। 


मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिनियाँ

वंशी की तान सुन, संग पतियों के 

नंदनंदन के पास चली आतीं 

उन्हें निहारने लगती हैं वे। 


कृष्ण की प्रेम भरी चितवन द्वारा 

किया सत्कार स्वीकार करतीं वे 

हे सखियों, हरिनियों की बात क्या 

स्वर्ग की देवियां भी जब उनको देखें। 


बांसुरी पर उनका मधुर संगीत सुन 

सुध बुध अपनी खो बैठतीं 

हे सखी, देवियों की बात छोडो 

देखो तो इन गौओं को ही। 


जब हमारे कृष्ण अपने मुख से 

बांसुरी का स्वर हैं भरते 

कान खड़े कर लेती हैं वो 

अमृतपान ये करने के लिए। 


अपने नेत्रों से श्यामसुंदर को 

ह्रदय में अपने ले जातीं वो 

आनन्द के आंसू छलकने लगते 

देखो कैसे उनके नेत्रों से। 


बछड़े भी जब दूध पीते हुए 

बंसीध्वनि सुनते कृष्ण की 

न उगल पाएं, न निगल पाते हैं 

मुँह में लिया हुआ दूध भी। 


वृन्दावन के पक्षिओं को तो देखो 

पक्षी कहना ही भूल है उनको 

अधिकांश बड़े बड़े ऋषि मुनि हैं 

उनमें से, सच पूछो तो। 


वृन्दावन के सुंदर वृक्षों की 

मनोहर डालियों पर बैठ कर 

निहाल होते वे श्री कृष्ण की 

प्यार भरी चितवन देखकर। 


त्रिभुवन मोहन संगीत बंसी का 

सुनते रहते हैं पक्षी वो 

उनका तो जीवन धन्य है 

कृपाप्रसाद मिला कृष्ण का उनको। 


सखी, ये जड़ नदियों को देखो 

जो इनके भंवर हैं उनमें 

पता चलता तीव्र आकांक्षा का 

मिलने की श्यामसुंदर से। 


प्रेम स्वरुप बंसी ध्वनि 

श्री कृष्ण की सुन ली इन्होने 

और उन बादलों को देखो 

प्रेम उमड़ रहा उनके ह्रदय में। 


कृष्ण और बलराम को देखकर 

उनके ऊपर मंडराने लगते 

घनश्याम के ऊपर श्यामधन अपना 

छाता बनाकर तान ये देते। 


नन्ही फुहियों की वर्षा करते जब 

श्वेत कुमुद चढ़ा रहे हों जैसे 

और अपने कृष्ण को देखकर 

कृतकृत्य हो रहीं, सब भीलनियाँ ये। 


गोपियों, यह गिरिराज गोवर्धन 

बहुत श्रेष्ठ भगवान के भक्तों में 

हमारे प्रणवालाभ कृष्ण और 

नयनाभिराम श्री बलराम के। 


चरणकमलों का स्पर्श प्राप्त कर 

कितना आनन्दित रहता है 

हे सखी, इन सांवरे और गोरे

किशोरों की निराली गति है। 


एक वन से दुसरे वन में 

हाँक कर गायों को ले जाते 

बांसुरी की तान छेड़ते 

मधुर मधुर संगीत बजाते। 


उस समय मनुष्यों की तो बात क्या 

चलने वाले चेतन पशु पक्षी सब 

और जड़ नदी आदि स्थिर हो जाते 

अचल वृक्ष भी रोमांचित होते तब। 


परीक्षित, गोपियाँ प्रतिदिन आपस में 

कृष्ण लीलाओं का वर्णन करतीं 

उनमें तन्मय हो जातीं और वे 

ह्रदय में स्फुरित होने लगतीं उनके ।



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