शिव भजन (पौराणिक)
शिव भजन (पौराणिक)
भोले की सूरत ही नहीं है भोली
है मिजाज भी बहुत भोला भाला सा,
जो भी करता है सच्चे मन से आराधना
कामना हो जाती है उनकी पल भर में पूरी...!!
ना चाहिए उन्हें ज्यादा चढ़ावा
एक लोटे के जल से खुश है जगत का प्रतापी,
भोले भंडारी तू है दीनों का दाता
बड़ी आसानी से कर देता है अपनी मेहरबानी...!!
बनाया है कैलाश पर्वत को तूने अपना ठिकाना
जहां नंदी का पहरा है भारी,
तीनों लोकों में बजता है डंका तेरा अभिनाशी
तेरी महिमा ना जाए बखानी....!!
अपने भक्तों का तू है सबसे बड़ा दानी
गौरा मां को बनाया है तूने अपनी पटरानी,
वहां चलती है उन्हीं की मनमानी
बड़ा गहरा रिश्ता है उनसे तेरा भोला भंडारी...!!
उनसे बनता है जीवन तेरा हर खुशी से मतवाली
कार्तिक और गणेश तेरे पुत्र है प्यारे,
एक का वाहन मयूर दूजे का मूषक बना अतरंगी
दोनों की गूंज से कैलाश पर्वत है रौशन भारी...!!
कहलाते हो तुम तीनों लोकों के स्वामी
तुम ही हो कापाली और कृपानिधि स्वामी,
शीश तुम्हारे गंगाधर हरदम बिराजे
जटाधारी तुम हो जगत के स्वामी....!!
भूत पिचास है तुम्हारे साथी
लिपटे रहते हैं वो तुम्हारे बनके साथी,
माला बने है भुजंग गले में तुम्हारे हर बारी
शोभा देते ही त्रिशूल और डमरू हाथों में भारी...!!
जब आ जाता है उनका गुस्सा कभी आती भारी
शुरू करते हो तब तुम तांडव ऐसा बलशाली,
काँप उठते हैं सारे देवता और नर नारी
छा जाता है चारों ओर घोर अंधकार भारी...!!
