शब्दों को वापस लाना
शब्दों को वापस लाना
मन में मची उथल पुथल....
न जाने क्यों इस मन की उथल पुथल से मुझे ख़ौफ़ होता है
क्योंकि ये उथल पुथल मुझे खामोश कर देती है
खामोशी मतलब शब्दों को खों देना...
शब्दों को खो देना मतलब भाषा को खो देना.....
शब्दों के ना होने से मेरी वेदनाओं का क्या होगा?
मेरी संवेदनाओं का क्या होगा?
क्या वे भी कही खो जाएगी?
और जब वेदना और संवेदनाएँ नही होगी तो क्या मैं जिंदा रह पाऊँगा?
फिर पसर सकती है एक लंबी खामोशी...
वेदना और संवेदना हीन की बेला शायद एक बार फिर वेदना का सृजन करेगी
नयी वेदना से नयी संवेदना....
नयी संवेदना को आवाज देते नये लफ्ज़...
उनसे बनते नये अल्फ़ाज...
नये अल्फ़ाज़ से बनती नयी भाषा....
नयी भाषा की फिर बनती एक नयी लिपि...
नयी लीपि के नये विचार...
और नये विचार की नयी संवेदनाएँ....
नयी संवेदनाएँ से बनता नया जीवन....
इस जीवन को जिन्दा रहना होगा...
क्योंकि शब्दों को वापस लाना एक कठिन काम है!
