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Harshita Jain

Abstract


4.6  

Harshita Jain

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शब्द

शब्द

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शब्द रूठे अल्फाज खोये; 

अब यही असमंजस है कि कुछ नया कहां से आए;

लिखते - लिखते कहा कलम ने कहां गया वह हूर ;

जब चंद लफ्जों में ही भर जाता था उपन्यास सा नूर; 

अब तो हर पल यही ख्याल आए;

शब्दों में कैसे भावनाओं को समेटा जाए; 

कुछ ज्यादा न सही ,गागर में ही सागर भरा जाए;

चंद पंक्तियों की खूबसूरती से ही गुलशन को संजोया जाए ।


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