Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Anjneet Nijjar

Abstract


4  

Anjneet Nijjar

Abstract


शब्द

शब्द

1 min 152 1 min 152

इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम?

कैसे बुनते हो ये ताना-बाना?

किस्सों की चादर कैसे बिछाते हो?

ये गीत-ग़ज़ल के तकियों पर

कैसे ख़्वाब बनाते हो?

कैसे गिरते हैं तुम्हारे अक्षर

उस चादर पर?

कैसे उसकी सिलवटों में

तुम उम्मीदें छिपाते हो?

इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम?

कैसे तुम्हारे पन्ने बन जाते हैं कम्बल?

घेर लेते हैं मुझे ऐसी दुनिया में

जहाँ मैं अदृश्य, और किरदार साकार होते हैं?

ऐसे टिमटिमाते भाव कहाँ से बनाते हो तुम?

इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम?

कैसे लेती हैं भावनाएँ अँगड़ाइयाँ?

कैसे अँधेरा भी रोशनी बन जाता है?

क्यों रात तुम्हारी कहानियों के बिना अधूरी है?

ऐसी क़लम कहाँ से लाते हो तुम?

इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम?


Rate this content
Log in

More hindi poem from Anjneet Nijjar

Similar hindi poem from Abstract