“ शाश्वत मित्रता “
“ शाश्वत मित्रता “
होश नहीं किसी को हैं यहाँ पर ,किसी को किसी की परवाह नहीं !
सब कोई अपनी धुन पर नाचे ,किसी को किसी से चाह नहीं !!
मेरे तो फेसबुक के पन्नों में ,हजार हस्तियाँ यूँ जुड़ने लगीं !
पक्षियों ने अपने पंख फैलाए ,दसों दिशाओं में यूँ उड़ने लगीं !!
जिसे मैं जानता हूँ पहले से ,उन्हीं से खुलके बातें होती हैं !
मेरी हर बातों को समझ कर ,उनकी तब प्रतिक्रिया बनती हैं !!
अब मित्र बनना आसान हुआ ,पर शीशे की तरह ये होते हैं !
मतभेदों से ही धूमिल होता है ,गिरकर चकनाचूर हो जाते हैं !!
जो संवादों से दूर ही रहता है ,जो प्रतिक्रिया से कतराता है !
जो परिभाषा ना समझा सका ,वो शाश्वत नहीं रह पाता है !!
