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Rashmi Singhal

Abstract

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Rashmi Singhal

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शापित हूँ "मैं"

शापित हूँ "मैं"

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बीहड़ों की हूँ रानी,मैं,

हर युग की हूँ कहानी,मैं,

रहती अनछुई,क्योंकि 

हूँ,शापित!

इसलिए अब तक

हूँ,अप्रदूषित,

   

न होते तट पर तीज-त्यौहार

न पूजा,हवन,न मंत्ररोच्चार,

द्रोपदी चीर-हरण की हूँ साक्षी बनीं

रंतिदेव-अग्निहोत्र में बहे,हजारों

गायों-बछड़ों के,रक्त से हूँ सनीं,


डाकुओं का मुझ पर रहता साया

कईं दस्यू-सुंदरियों ने अपना

परचम फहराया,

समय-समय पर खड़े हुए मुझ

पर अनेकों सवाल

रहते ड़ेरा ड़ाले यहाँ मगर व 

घड़ियाल,


जल नहीं लहू सी नदी है बहती

मछलियाँ नहीं अपितु लाशें तैरती,

विकल बड़ी कँदराएँ हैं,मेरे आर-पार

सदियों से मेरी धरती पर गुँज रहा 

है हाहाकार,


हूँ,नदी मैं बड़ी अभागी

प्रदूषण रहित,पर,फिर भी दागी,

गंगा,कावेरी,सरस्वती आदी सब ही

नदीयाँ आती इस काम

पर,रखता नहीं है चम्बल कोई

अपनी बेटी का नाम,


गीत,वक्त ने मुझ पर ढ़ेरों गाए

पर,वे बोल किसी के मन न भाए,

हूँ,स्वयंवीरा,बहती हूँ मैं कलकल

है मेरा अलग अपना इतिहास

नाम है मेरा,चम्बल ।

 

      


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