सदाचारी
सदाचारी
कितनी योनियों को पारकर
उत्तम यह मनुष्य योनि पाई है
कर्मों की परिभाषा भूला इंसान
आचरण उसका अब दुखदाई है
हर हाल में अपने लक्ष्य की पूर्ति
एकल उद्देश्य अब बन गया है
स्वार्थ, ईर्षा से भरा हर अंतर्मन
सब मायावी दुनिया के अनुयाई है
मासूमों की मासूमियत बेमोल है
भीतर बहते आंसू दिखते कहां
उमंगों की परिभाषा बदली है
अब बचे कहां यहां उपकारी है
वाणियों से बहता है कड़वापन
शूल के जैसे शब्दों का आचरण
किसको समझे पथ प्रदर्शक
भ्रमित हैं पथ, भौचक्का हर राही है
जाने कैसी विवशता है वातावरण में
गतिविधि समाज की क्यों बदली है
जिस देह पर अपना अधिकार नहीं
उसी के लिए क्यों इतनी आपाधापी है
क्यों न कर्मों पर अनविचिलित ध्यान दें
कब सांस साथ छोड़ जाए, नहीं पता
द्वेष, ईर्षा, स्वार्थ छोड़, सिर्फ प्रेम से
जीए जो जीवन, वही सदाचारी है.......
