सब समर्पित
सब समर्पित
मैं रमा रहूं नित्य तेरे आनंद रूप में,
चिन्मय व्यापार बना बना रहूँ तुम्हारा।
मैं अकिंचन सा विचरूँ अशुद्ध काया लिए,
और कितना महान प्रभु विस्तार तुम्हारा।।
नित्य माया माया में तन रमा रहा,
मन योगी न ये होने पाए कभी।
पकंज पात सा अपरस हूँ बना हुआ,
बन वैरागी गीत तेरा न गा पाए कभी।।
भ्रमित हुआ हूँ जग का वैभव देख,
लिप्त हुई प्रबल छाया से ये काया है।
जानता हूँ अटल सत्य है सत्य शिव ही,
बन चिर भ्रमित कोमल मन भरमाया है।।
तुम मुझे वो शक्ति दो मेरे प्रभु,
जन जन का आंसू सहांरक बन जाऊँ।
युंगों युंगों की चली आ रही रीत निभाऊं,
वक्त पड़े दधीचि सा मैं त्याग कर जाऊँ।।
ये क्षणिक तृण सम जलने वाला शरीर,
साँस निकले बिखरे माटी सा यहाँ वहाँ।
मैं बन कर रहूँ तेरा बस अंश मात्र प्रभु,
मन लागे बस तेरा सु सुमिरन हो जहाँ।।
मेरा मन तन भाव सब कुछ तुझे समर्पित,
भटका दे बना निर्वासित या बना दे आवासित।
बना दे धनुर्धर रण कौशल का उपहार दे दे,
प्रभु मुक्त करो अब न रहूँ चिर अभिशापित।।
मैं तुम्हारे श्री चरणों की धूली भर हूँ,
तुम उज्ज्वलता की अपार सीमा हो,
समस्त सृष्टि एक धूमिल तारे जैसी,
हे आराध्य!देख समर्पण न मेरा धीमा हो।।
तेरी दिव्य दृष्टि इस निर्धन पर पड़े कभी,
तो विहंगम भाव सजी इक नई इमारत बने।
बस एक धार बहे सब ओर सर्वस्व समर्पण की,
समर्पण इस राह पे नित्य अभिसार बगावत बने।।
