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Anupam Mishra

Fantasy

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Anupam Mishra

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साँसों का भार

साँसों का भार

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साँसे जरूर चल रही हैं

पर हर साँस पर कोई बोझ सा है,

जैसे कोई साँसे कहीं से उधार ली है,

उसपे किसीका क़र्ज़ सा है;


जी तो रही अपनी ये ज़िन्दगी

पर हर कदम ठहर सा जाता है,

जैसे किसीने राह रोक रखी है,

भीतर एक डर सा छिपा है;


जाने कितने एहसान हैं जीवन पर,

जन्म से लेकर वर्त्तमान अर्जन पर,

उनमे से एक के भी लौटा पाऊँ अगर,

तो मौत को ख़ुशी ख़ुशी गले लगा लूँ फिर॥


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