साँसों का भार
साँसों का भार
साँसे जरूर चल रही हैं
पर हर साँस पर कोई बोझ सा है,
जैसे कोई साँसे कहीं से उधार ली है,
उसपे किसीका क़र्ज़ सा है;
जी तो रही अपनी ये ज़िन्दगी
पर हर कदम ठहर सा जाता है,
जैसे किसीने राह रोक रखी है,
भीतर एक डर सा छिपा है;
जाने कितने एहसान हैं जीवन पर,
जन्म से लेकर वर्त्तमान अर्जन पर,
उनमे से एक के भी लौटा पाऊँ अगर,
तो मौत को ख़ुशी ख़ुशी गले लगा लूँ फिर॥
