Anupam Mishra
Abstract
तकदीर को रोते फिरे हम
तस्वीर भी धूँधली हो चली,
तकलीफ़ बढ़ती ही रही,
तलाशने चैन को जो निकली
तह में हृदय के वो सिमटी मिली।
मेरी माँ
इश्क़ और समाज
साँसों का भार
चैन
बहुत छोटी है न तेरी ये ज़िन्दगी बहुत छोटी है न तेरी ये ज़िन्दगी
जब मैं बोल भी नहीं पाता था.. सिर्फ़ मेरे इशारों से मैंने उन्हें हर ख्वाहिश पूरा करते दे जब मैं बोल भी नहीं पाता था.. सिर्फ़ मेरे इशारों से मैंने उन्हें हर ख्वाहिश पूर...
जो बाल्यकाल में भ्राता को विष देने का साहस करता, कि लाक्षागृह में धर्म राज जल जाएं जो बाल्यकाल में भ्राता को विष देने का साहस करता, कि लाक्षागृह में धर्म राज जल...
यह मुझे समझ नहीं आता इतना समझने की जरूरत भी क्या है यह मुझे समझ नहीं आता इतना समझने की जरूरत भी क्या है
नहीं मिलेगा कहीं नहीं मिलेगा, जहां तुम हो बस वही मिलेगा। नहीं मिलेगा कहीं नहीं मिलेगा, जहां तुम हो बस वही मिलेगा।
आजादी का मतलब क्या है हम आप जानते हैं? आजादी का मतलब क्या है हम आप जानते हैं?
एक फूल का मिट जाना हीं, उपवन का अवसान नहीं। एक फूल का मिट जाना हीं, उपवन का अवसान नहीं।
द्रौपदी की करुणा पुकार क्यों नहीं सुन पा रहे हो? द्रौपदी की करुणा पुकार क्यों नहीं सुन पा रहे हो?
अभी नहीं मालूम जीवन की कड़वी सच्चाइयां अभी नहीं मालूम जीवन की कड़वी सच्चाइयां
गीत लिखूंगा मैं गांऊंगा मैं ऊंचे स्वरों में भारत देश की महिमा। गीत लिखूंगा मैं गांऊंगा मैं ऊंचे स्वरों में भारत देश की महिमा।
गुलामी की बेड़ियों को हमने कई वर्षों तक सहा है, क्या होती गुलामी लंबे समय तक महसूस किय गुलामी की बेड़ियों को हमने कई वर्षों तक सहा है, क्या होती गुलामी लंबे समय तक ...
सर पर फैलाई थी रंगीन छतरी, जिसके अनगिनत, छिद्रों में झांक सर पर फैलाई थी रंगीन छतरी, जिसके अनगिनत, छिद्र...
सूरज की किरणों से आज, स्वयं नग्न जल जाऊं मैं सूरज की किरणों से आज, स्वयं नग्न जल जाऊं मैं
तब राम का नाम जुबां पे आता तो है फिर भी वह सत्य को झुठलाता है तब राम का नाम जुबां पे आता तो है फिर भी वह सत्य को झुठलाता है
मेरा संसार जहां सुबह जैसी सुबह है और शाम जैसी शाम है। मेरा संसार जहां सुबह जैसी सुबह है और शाम जैसी शाम है।
समय किसी के हाथ न आया समय की है अजब ही माया इसके आगे हर कोई झुकता समय किसी के लिए न रुकता। समय किसी के हाथ न आया समय की है अजब ही माया इसके आगे हर कोई झुकता समय किसी के...
तेरा बुत बनू और बंद रहूँ मंदिर के तालों में, तेरा बुत बनू और बंद रहूँ मंदिर के तालों में,
अपने आपको ही बेवकूफ बनते हैं खुद ही खुद को गुमराह करते हैं अपने आपको ही बेवकूफ बनते हैं खुद ही खुद को गुमराह करते हैं
युद्ध तो विध्वंसक है कि युद्ध तो विध्वंसक है। युद्ध तो विध्वंसक है कि युद्ध तो विध्वंसक है।