सांस का अहसास
सांस का अहसास
जाने कैसे...
एक फोन की घंटी चुप हो गई
जाने कैसे तबीयत...
पूछने और बताने की रवायत बंद हो गई
वो आवाज़ जो सुकून की सांस थी
अब बस खामोश हो गई...
अब ना दुख से रोना, ना सुख का अहसास है
कौन कैसे जी रहा है, किसी को परवाह नहीं
दिन रात और मौसम भी कायदे बदल रहा है
मैं भी जिंदा ही हूं के दिल अभी धड़क रहा है,
तपती धरा पे बरसात से उठता गुनगुना धुआँ
गरम हवा का झोंका यूं जमा रहा रेत पर पानी
ये उलझे उलझे से आसार जाने क्या मकसद है
कितना ही बरसेंगे मेरे बादल के इनकी भी हद है,
जीते सब हैं मगर जिंदगी की सांस चली जाती है
जब किसी अपने के जाने से आंखें नम हो जाती हैं
दिलासा कितना ही दे भला कोई फिर संभलने का
ये कैसा होश है मेरा के...
जिसमें मैं तो हूं, मगर रूह जिस्म से निकल जाती है,
लेकिन अब संभलना होगा...
पत्ते को शाख से
लहर को दरिया से
धूल को पर्वत से
वर्षा को बदरी से
जिस्म को जान से...
अब मुझे एक एक सांस का अहसास हो
हर पल को जी भर जीने की प्यास हो
अब मैं भी अपने होश से मुलाकात करूं
मिलूं भरपूर ऐसे कि किसी को खुद से दूर ना होने दूं।
