साम्राज्य!
साम्राज्य!
रामराज्य सच था या सपना,
साम्राज्य यह याद दिलाये।
जन जीवन की सुख समृद्धि का,
अनुपम सा उपहार दिलाये।।
सच की आंखें आगे- पीछे,
झूठ सुबकते रोते देखे।
जैसा करना वैसा भरना ,
चोर चकार हमेशा डरते।।
रामराज्य होता सम्मानित,
विपुल सम्पदा से हो भारित।
दूध दही की नदियाँ बहती,
झूठ सदा होता अपमानित।।
क्रूर लुटेरे शासक भी थे ,
हिंसक होकर करते हमले।
बहू बेटियों की इज़्ज़त से,
हम चिंतित थे कैसे संभलें।।
अंत हुआ उस दौर का फिर भी,
मुगल, पारसी या हों अरबी।
आया नई सुबह का दौर भी,
सुख सम्पदा को मिला ठौर भी।।
