सामने तो आओ
सामने तो आओ
क्यों बनी हुई हो तुम एक पहेली ज़रा सामने तो आओ,
हकीकत हो या हो मेरी आंँखो का भ्रम कुछ तो बताओ।
हवाओं में, फिज़ाओं में, अक्सर महसूस करता मैं तुम्हें,
ख़्वाबों में हो कभी हक़ीक़त बन ज़िन्दग़ी में तो आओ।
छूकर गुज़र जाती हो कभी, एहसास जगाकर दिल में,
उन एहसासों को बयां करने का बस एक मौका तो दो।
दीद़ार-ए-हुस्न के बिना ही मोहब्बत कर बैठे हैं बेइंतेहा,
अब इंतजार के इन लम्हों कोई एक बार विराम तो दो।
सुनी है हमने तुम्हारी वो रुनझुन सी पायल की आवाज़,
जो बढ़ा गई है बेचैनी दिल की, उसकी अब दवा तो दो।
मश अल ए महताब तुम्हारा बस चुका है इन आंँखों में,
जी रहे बस तुम्हारे ही तसव्वुर में, ज़रा सामने तो आओ।

