साड़ी बिच नारी
साड़ी बिच नारी
जब से हम तथाकथित सभ्य,समृद्ध हो गए हैं,
मन के विचार ओछे ,तन के कपड़े छोटे हो गए हैं।
सड़क पर साड़ी में चलती हर स्त्री
जहां मां,बहिन का अहसास करा जाती थी,
आज फटी जीन्स,खुले टॉप में
आइटम बम नज़र आती है।
बदलाव लाना चाहिए,जरूर लाना चाहिए
पर इतना भी खुद को न गिराना चाहिए।
साड़ी में ढकी जो नारी दिव्य लगती है,
उसे बिना कवर की किताब न बनाओ।
पहनो साड़ी,पुराने डिज़ाइन से ही
फैशन के नाम पर,ढोंग न दिखाओ।
खुद को दिखाना है तो अपने बच्चों
को ऐसे संस्कारों से नवाज़ों...
राह चलती लड़कियां सुकून से चल सकें
किसी के मन में,कोई काम्प्लेक्स न पल सके।
अगर साड़ी पहनी है,तो वो साड़ी ही दिखनी चाहिए
उसके नाम पर देह प्रदर्शन की नुमाइश नहीं चाहिए।
खुद को मॉडर्न,अमीर दिखाने के चक्कर में
खुद को इतना भी न गिराइए।
कि आने वाली पीढियां कभी माफ न कर सकें,
कोई भी आपके साथ इंसाफ न कर सके।
नारी यत्र पूज्यते,रमन्ते तत्र देवता
को सार्थक फिर से करवाना है,
खुद को प्रदर्शन की वस्तु बनने
से गर बचाना है...
तो साड़ी ठीक से पहननी शुरू कर दें
खुद को नुमाइश बनने से रोक दें।
साड़ी में आज भी आप सबसे सुंदर दिखती हैं
लक्ष्मी,सीता,सावित्री,गार्गी सी लगती हैं।
पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला
कर चलने के लिए क्या कंधा
बेपर्दा करना जरूरी है??
ये तो केवल दिखाता आपके
मन की कमजोरी है।
अपनी शक्ति,अपने लड़कों को
नारी का सम्मान करने सिखाने में लगाएं,
अपनी बेटी को कमजोर,कोमल गुड़िया
नहीं,साक्षात दुर्गा,काली बनाएं।
नारी चाहे तो क्या नहीं कर सकती...
समाज की धारा बदल सकती है
चट्टान से धारा निकाल सकती है।
अपनी शक्ति को पहचानो
बदलो समाज को,सोच को
ये वक्त की पुकार है
सबकी यही दरकार है।
