रूढ़ियों का लॉकडाउन (2)
रूढ़ियों का लॉकडाउन (2)
प्रिय डायरी,
आज पता पड़ा चारदीवारी क्या होती है,
क्या होता है खुद को समेट के रखना।
औरतों को कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा,
वह तो सदियों से ही लाकडाउन हैं।
बस इक्कीस दिन ही तो घर रहना है,
पर तुम तो दो दिन मैं बैचेन हो गए।
कुछ दिन के लिए ही सही तुम्हें पता
तो चला क्या होता बंधन अनचाहा,
अब भी वक्त नहीं गुजरा है सुधार लो,
कुछ गलतियां जो सदियों से हो रहीं हैं
औरत जीना आहती है खुली साँस में,
मत बाँधो इसे रूढ़ियों की जंजीरों में।
