ऋतु गुलाबी
ऋतु गुलाबी
शक्ति रूप माँ का हुआ आगमन ,
गुलाबी गुलाबी सा हुआ ये मौसम,
खुमारी गुलाबों की छा रही धरा पर,
तज देंगे बुराई माँ खाते हैं कसम,
खुद को ना अबला बनने देंगे,
डट कर अन्याय का सामना करेंगे,
स्त्रीत्व मातृत्व नारी का गहना,
परंतु किसी पुरुष का दंभ क्यों सहना,
नौ दिन का माँ साथ तुम्हारा,
माँ दो आशीर्वाद अपना लें आचरण तुम्हारा,
माँ तुम झोलियॉं भर देती हो,
दुख हम सबके हर लेती हो ,
हे करूणामयी दयानि़धे,
मातृत्व का एहसास कराती वारिधे,
आस्तित्व तुम्हारा अलग कहॉं ,
माँ से माँ है विरक्त कहॉं,
एक रूप से शक्ति शालिनी,
दूजे से धैर्य क्षमा प्रेम युक्त मालिनी,
सम्पूर्ण स्त्रीत्व की तुम गौरवशाली छाया,
रूपों की महिमा कोई समझ ना पाया,
गुलाबी नयन चमक रहे विजय द्वारा,
गुलाबी रंग में सज गया जहॉं ये सारा ,
ऋतुओं नें भी ओढ़ी गुलाबी रंगत,
ग्रीष्म शीत की देखो हो गई संगत,
धरती नभ हर्षित हो रहे,
माँ को देख पुलकित हो रहे,
हो रही पुष्पों की वर्षा,
सुर नर मुनि जन सबका मन हर्षा,
गुलाबी धुएं में लिपटा जग सारा ,
आनन्द मगन मन झूमे असुर था हारा,
विजय पताका लहर लहर लहराई,
विजयी होती हमेशा सच्चाई ,
सच्चाई का कभी साथ ना छूटे,
माँ तेरा कभी हाथ ना छूटे,
कोई विधि आवत नहीं उपासना कैसे करूं,
दिल में बसी हो आप सिमरन आठों पहर करूं ..!!
