रणचंडी है वो काली है
रणचंडी है वो काली है
अविराम चले जो विश्व पटल तक, कैसे वो नारी अबला है;
रणचंडी है ,वह काली है, दावानल सी वह ज्वाला है।
हर युग में अपनी महाशक्ति से परिचित इसने करवाया,
कभी अपाला, कभी गार्गी बन, कोष ज्ञान का बिखराया,
इसने ही जयवंता, जीजाबाई बन महा सपूतों को पाला है,
रणचंडी है वह काली है, दावानल सी वह ज्वाला है.....
वैसे तो यह कुसुम समान सुकोमल है,
सबके जीवन के कंटक चुनने को बिखराती अपना अंचल है,
पर बात यदि स्वाभिमान की हो,तो बन जाती नारी विकराला है;
रणचंडी है वह काली है, दावानल सी वह ज्वाला है.....
जल में, थल में, नभ में, हर जगह इसी का परचम है,
क्या अब भी कह सकता कोई,नारियां अक्षम हैं?
दस भुजाएं नहीं पर हर रूप उसका नतमस्तक करने वाला है,
रणचंडी है वह काली है,दावानल सी वह ज्वाला है।।
