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Dhan Pati Singh Kushwaha

Inspirational

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Dhan Pati Singh Kushwaha

Inspirational

रहें परस्पर मेलजोल से

रहें परस्पर मेलजोल से

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आदिकाल से चल रहा चक्र यह,

न हो पाता कई जगह बदलाव।

स्वार्थ सिद्धि की प्रबल भावना पर,

परहित भाव का लगता है अभाव।


परसुख ही प्राय: है दुःख का कारण,

तुलना कर हम सब लेते दुःख मोल।

जो प्राप्त हुआ है प्रभु अनुकम्पा से,

वह भी पर्याप्त बहुत है और अनमोल।

मिल न सका वह बहुतों को अब भी,

हमसे गहरे सागर में है उनकी नाव।

स्वार्थ सिद्धि की प्रबल भावना पर,

परहित भाव का लगता है अभाव।


मृत्यु ही अकाट्य सत्य है हर जीवन का,

वह कब आ जाएगी यह तो कोई न जाने।

जान बूझ अनजान बने रहते हैं सब जन,

सब करते हैं बहुविध ही नित नये बहाने।

अनावश्यक संग्रह में खपा देते हैं जीवन,

जग नश्वरता-प्रभु शुभता का भुलाते भाव।

स्वार्थ सिद्धि की प्रबल भावना पर,

परहित भाव का लगता है अभाव।


विकास पथ पर हम सब रहें अग्रसर,

सबको हितकारी हों सबके ही प्रयास।

बेशर्त करें वितरित हम निज खुशियां,

दूजे से न कोई अपेक्षा न ही कोई आस।

यदि करी अपेक्षा और वह हुई न पूरी,

बेमतलब ही देगी गहन दुःख का भाव।

हम सब सदा ही रहें परस्पर मेलजोल से,

रख प्रभु शुभता का दृढ़ अविचलित भाव।



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