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अमित प्रेमशंकर

Abstract Tragedy

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अमित प्रेमशंकर

Abstract Tragedy

रे सजना सिपाही..!

रे सजना सिपाही..!

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रे सजना सिपाही मोरे देश के पुजारी

दिन लागे आधा आधा रात लागे भारी


मन के मनाईं कवना खाई के दवाई

सहलो सहाता ना ई नेह के जुदाई 


भावे ना इ तीज व्रत गहना न सारी

सुना सुना कोना लागे अंगना दुआरी 


बही बही झील भईल नैन कजरारी 

दिन लागे आधा आधा रात लागे भारी।।


अंसुवा के धार से लिखले बा हाल जी

रोई-रोई असरा में भईलीं बेहाल जी


छछन छछन जाई निकल सवारी 

आ जा छुट्टी लेके घरे, ध के कवनो गाडी 


हिय के जुड़ाई दिहा ले के अंकवारी 

दिन लागे आधा आधा रात लागे भारी।।


रे सजना सिपाही मोरे देश के पुजारी

दिन लागे आधा आधा रात लागे भारी।।


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