रामायण ६३ ;कलयुग का वर्णन
रामायण ६३ ;कलयुग का वर्णन
पूर्व के एक कलप में
जब कलयुग का जोर बड़ा था
पुरुष, स्त्री सब अधर्म परायण
वेदों का विरोध बड़ा था |
अयोध्यापुरी में मेरा जन्म हुआ
शुद्र के घर पैदा हुआ मैं
शिवजी का मैं भक्त बहुत था
विष्णु की निन्दा करता मैं |
धन के मद में मैं मतवाला
कठिन वो कलिकाल बड़ा था
सभी लोग थे पाप परायण
झूठ बड़ा बलवान खड़ा था |
कलयुग ने धर्मों को ग्रास किया
सदग्रन्थ सारे लुप्त हो गए
दम्भियों ने नए पंथ प्रकट किये
लोग मोह माया में खो गए |
लोभ ने शुभ कर्मों को हड़प लिया
ना वर्ण, ना आश्रम रहे
सभी लोग वेदों के विरोधी
ब्राह्मण भी ज्ञान की बात ना कहें |
राजा प्रजा को खाने वाला
वेदों की आज्ञा कोई न माने
ब्राह्मण वेदों को बेचने वाले
जो अच्छा लगे, वही मार्ग जानें |
डींगे हांके जो, वो पंडित है
आडम्बर रचे,उसे संत हैं कहते \
बुद्धिमान उसे कहते जो
दूजे का धन हरते रहते |
झूठ बोले, गुणवान कहावे
आचारहीन जो, वो ज्ञानी है
वैराग्यवान वो ही पुरुष है
वेदों की जिसने ना मानी है |
बड़े नख, लम्बी जटाएं
उसी को बस तपस्वी जानो
अमंगल वेश भूषा में जो है
योग, सिद्ध उसी को मानो |
अहित करे, जो दूजे का
गौरव बहुत उसी का होता
झूठ बोलने मैं जो माहिर
उसी को माना जाता वक्ता |
मनुष्य स्त्रियों के हैं वश में
शूद्र ब्राह्मणों को ज्ञान हैं देते
गले में अपने पहन जनेऊ
उनकी तरह वो दान हैं लेते |
काम लोभ में सभी हैं तत्पर
और सभी क्रोधी होते हैं
ब्राह्मण वेदों की न मानें
संतों के विरोधी होते हैं |
स्त्रियां सूंदर पति छोड़ कर
पर पुरुषों का सेवन करतीं
सुहागिनें आभूषण रहित हैं
विधवा वहां श्रृंगार हैं करतीं |
शिष्य गुरु का उपदेश न सुने
गुरु भी ना देखे, क्या सीखा
बहरे, अंधे का सा रिश्ता
गुरु धन हरण करे शिष्य का |
माता पिता वही धर्म सिखावें
जिससे सिर्फ पेट है भरता
थोड़े से ही लाभ के लिए
करते ब्राह्मण गुरु की हत्या |
मनमाना आचरण सब मनुष्यों में
कार्य अनीति के करते जाते
पाप करें और दुःख पाएं वो
भय, रोग और वियोग हैं पाते |
तपस्वी हैं धनवान हो गए
गृहस्थ वहां हैं बड़े दरिद्र
सती स्त्री को घर से निकालें
पुरुष दासी को रखते अंदर |
राजा दण्ड देता प्रजा को
सबके सारे पुण्य विलीन हैं
धनी चाहे कितने मलीन हों
माने जाते वो कुलीन हैं |
बार बार अकाल हैं पड़ते
लोग दुखी होकर मरते हैं
बोया हुआ अनाज न उगे
देवता वर्षा न करते हैं |
मनुष्य रोगों से पीड़ित है
सुख का नामो निशान नहीं है
कलिकाल ने बेहाल किया मनुष्यों को
संतोष, विवेक और ज्ञान नहीं है |
ईर्ष्या, डाह, लालच भरपूर है
शीतलता मन में कोई न पाए
पर एक गुण है बहुत बड़ा कि
बिन परिश्रम सब बंधन मिट जाएं |
सतयुग, त्रेता, और द्वापर में
जो गति यज्ञ, योग से आये
कलयुग में बस राम नाम से
वो गति प्राप्त हो जाये |
कलयुग में मानसिक पुण्य हैं
पर मानसिक पाप न होते
धर्म के चारों चरणों में से
दान रुपी प्रधान हैं होते |
