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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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रामायण ६३ ;कलयुग का वर्णन

रामायण ६३ ;कलयुग का वर्णन

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66

 

पूर्व के एक कलप में 

जब कलयुग का जोर बड़ा था 

पुरुष, स्त्री सब अधर्म परायण 

वेदों का विरोध बड़ा था | 


अयोध्यापुरी में मेरा जन्म हुआ 

शुद्र के घर पैदा हुआ मैं 

शिवजी का मैं भक्त बहुत था 

विष्णु की निन्दा करता मैं | 


धन के मद में मैं मतवाला

कठिन वो कलिकाल बड़ा था 

सभी लोग थे पाप परायण 

झूठ बड़ा बलवान खड़ा था | 


कलयुग ने धर्मों को ग्रास किया 

सदग्रन्थ सारे लुप्त हो गए 

दम्भियों ने नए पंथ प्रकट किये 

लोग मोह माया में खो गए | 


लोभ ने शुभ कर्मों को हड़प लिया 

ना वर्ण, ना आश्रम रहे 

सभी लोग वेदों के विरोधी 

ब्राह्मण भी ज्ञान की बात ना कहें | 


राजा प्रजा को खाने वाला 

वेदों की आज्ञा कोई न माने 

ब्राह्मण वेदों को बेचने वाले 

जो अच्छा लगे, वही मार्ग जानें | 


डींगे हांके जो, वो पंडित है 

आडम्बर रचे,उसे संत हैं कहते \

बुद्धिमान उसे कहते जो 

दूजे का धन हरते रहते | 


झूठ बोले, गुणवान कहावे 

आचारहीन जो, वो ज्ञानी है 

वैराग्यवान वो ही पुरुष है 

वेदों की जिसने ना मानी है | 


बड़े नख, लम्बी जटाएं 

उसी को बस तपस्वी जानो 

अमंगल वेश भूषा में जो है 

योग, सिद्ध उसी को मानो | 


अहित करे, जो दूजे का 

गौरव बहुत उसी का होता 

झूठ बोलने मैं जो माहिर 

उसी को माना जाता वक्ता | 


मनुष्य स्त्रियों के हैं वश में 

शूद्र ब्राह्मणों को ज्ञान हैं देते 

गले में अपने पहन जनेऊ 

उनकी तरह वो दान हैं लेते | 


काम लोभ में सभी हैं तत्पर 

और सभी क्रोधी होते हैं 

ब्राह्मण वेदों की न मानें 

संतों के विरोधी होते हैं | 


स्त्रियां सूंदर पति छोड़ कर 

पर पुरुषों का सेवन करतीं 

सुहागिनें आभूषण रहित हैं 

विधवा वहां श्रृंगार हैं करतीं | 


शिष्य गुरु का उपदेश न सुने 

गुरु भी ना देखे, क्या सीखा 

बहरे, अंधे का सा रिश्ता 

गुरु धन हरण करे शिष्य का | 


माता पिता वही धर्म सिखावें 

जिससे सिर्फ पेट है भरता 

थोड़े से ही लाभ के लिए 

करते ब्राह्मण गुरु की हत्या | 


मनमाना आचरण सब मनुष्यों में 

कार्य अनीति के करते जाते 

पाप करें और दुःख पाएं वो 

भय, रोग और वियोग हैं पाते | 


तपस्वी हैं धनवान हो गए 

गृहस्थ वहां हैं बड़े दरिद्र 

सती स्त्री को घर से निकालें 

पुरुष दासी को रखते अंदर | 


राजा दण्ड देता प्रजा को 

सबके सारे पुण्य विलीन हैं 

धनी चाहे कितने मलीन हों 

माने जाते वो कुलीन हैं | 


बार बार अकाल हैं पड़ते 

लोग दुखी होकर मरते हैं 

बोया हुआ अनाज न उगे 

देवता वर्षा न करते हैं | 


मनुष्य रोगों से पीड़ित है 

सुख का नामो निशान नहीं है 

कलिकाल ने बेहाल किया मनुष्यों को 

संतोष, विवेक और ज्ञान नहीं है | 


ईर्ष्या, डाह, लालच भरपूर है

शीतलता मन में कोई न पाए 

पर एक गुण है बहुत बड़ा कि 

बिन परिश्रम सब बंधन मिट जाएं | 


सतयुग, त्रेता, और द्वापर में 

जो गति यज्ञ, योग से आये 

कलयुग में बस राम नाम से 

वो गति प्राप्त हो जाये | 


कलयुग में मानसिक पुण्य हैं 

पर मानसिक पाप न होते 

धर्म के चारों चरणों में से 

दान रुपी प्रधान हैं होते | 

 


 




 

 






 

 



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