रामायण ४६ ;युद्धारम्भ
रामायण ४६ ;युद्धारम्भ
मंदोदरी ने फिर समझाया
रघुनाथ से ना करो युद्ध
शरणागत के वो रक्षक हैं
छोड़ें न जब हो जाएं क्रुद्ध।
लक्ष्मण की खींची एक रेखा को
लाँघ न तुम पाए थे वहां
मुझे बताना तुम्हारा पुरुषार्थ
उस वक्त था गया कहाँ।
एक दूत हनुमान है उनका
समुन्द्र खेल में लाँघ गया
राम का बल अतुलनीय है, उन्होंने
समुन्द्र को भी बाँध लिया।
जिसका काल निकट आ जाये
भ्रम हो उसे, जैसे है तुमको
दो पुत्र मारे गए हैं
त्यागो वैर राम से अब तो।
सुनी एक न रावण ने उसकी
अगले दिन सभा में गया
लगे डर न राम का उसको
छाती फुलाकर बैठ गया।
उधर सुबेल पर्वत पर बैठे
राम अंगद को बुलाएँ पास
पूछें चार मुकुट फेंके जो
कहो उन में क्या कुछ है ख़ास।
अंगद बोले, मुकुट नहीं वो
राजा के वो गुण हैं चार
साम,दान,दंड और भेद हैं
उनमें रहें, जिनके उच्च विचार।
धर्म छोड़ दिया रावण ने
छोड़ के उसको ये हैं आए
सुन के राम अंगद को, हंस पड़े
उनको अंगद बहुत थे भाए।
अंगद ने किले की जानकारी दी
राम बुलाए मंत्री सब
चार बड़े दरवाजे हैं, कहो
कैसे करें आक्रमण अब।
चार दल बनाये वानरों ने
सेनापति नियुक्त किये
लंका को घेरा सभी और से
अस्त्र शस्त्र सब थे दिए।
लंका में कोहराम मच गया
रावण कहे, राक्षसो तुम जाओ
शत्रु की सेना को मारो
रीछ वानरों को तुम खाओ।
जय जय जय की ध्वनि हो रही
युद्ध हुआ प्रारम्भ वहां
रामचंद्र के प्रातप से वानर
मारें राक्षस जहाँ तहां।
लोटे भागकर योद्धा, सुना ये
रावण क्रोध में बोला तब
पीठ दिखाकर भागेगा जो
मार डालूँगा उसको अब।
पश्चिम द्वार पर हनुमान जी
मेघनाद से युद्ध करें
टूटे न वो द्वार किले का
क्रोध में किले ऊपर चढ़े।
पहाड़ ले मेघनाद पर दौड़े
तोडा रथ और मारी लात
एक सारथि मार दिया उसका
दूजा उसे ले गया अपने साथ।
अंगद भी आ गए वहीँ पर
ढायें किला मचाएं उत्पात
स्त्रियां कहें वानर ये लंका जलाई
अब दूजा आ गया इसके साथ।
दिन ढल जाने पर सभी योद्धा
आये थे वापिस राम के पास
सायं काल का बल पाकर राक्षस
धावा बोलें करें अट्टहास।
अकम्पन,अत्तिकाय दो सेनापति
करें माया, अन्धकार हुआ
खून, पत्थर राख की वर्षा
वानरों में हाहाकार हुआ।
जाना रहस्य रघुनाथ ने
अग्नि बाण छोड़ा था तब
हुआ प्रकाश, अँधेरा मिट गया
राक्षसों को मारें वानर अब।
रावण की आधी सेना ख़तम हुई
मंत्रिओं से विचार करे
माल्यवान एक बूढा राक्षस कहे
बात पर मेरी ध्यान धरें।
रावण का नाना भी था वो
कहे गलती तुम्हारी है सारी
जब से सीता हर लाये हो
यहाँ अपशकुन हो रहे भारी।
राम विमुख हो जाता है जो
सुख कभी वो पाए ना
राम तो एक भगवान का रूप हैं
वो दुखी, शरण जो जाये न।
रावण कहे निकल जा यहाँ से
उसके वचन लगे बाण समान
कहे रावण ना दिखाना मुँह मुझे
उसको था बहुत अभिमान।
मेघनाद क्रोध में बोला
सुबह देखें मेरी करामात
बहुत बड़ा मैं करूं कल सुबह
अभी करूँ न ज्यादा बात।
पुत्र वचन सुन खुश हुआ रावण
गोद में तब बिठाया उसको
मेघनाद सुबह देखी वानर सेना
बहुत था गुस्सा आया उसको।
कहे कहाँ हैं दोनों भाई
कहाँ नल नील, सुग्रीव कहाँ है
कहाँ है बलशाली हनुमान
और भाई द्रोही विभीषण कहाँ है।
आज मैं सब को मार के जाऊं
बाणों की वो करे बौछार
हनुमान उठाया एक पर्वत
दिया मेघनाद को मार।
वो उड़ कर आकाश में गया
दुर्वचन कहे राम को जाकर
अस्त्र शस्त्र सभी चलाये
प्रभु ख़त्म करें उन्हें काटकर।
करने लगा था फिर वो माया
अंगारे बरसाने लगा था
पीव, खून हड्डिओं की वर्षा
अन्धकार लाने लगा था।
वानर सब भयभीत हो गए
प्रभु ने तब एक बाण चलाया
सारा अंधकार मिट गया
काट दी उसकी सारी माया।
