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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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रामायन ३७;सीता हनुमान मिलाप

रामायन ३७;सीता हनुमान मिलाप

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छोटा रूप धरा हनुमान ने

नगर में तब प्रवेश किया

महल महल ढूंढें सीता को

रावण को भी वहां देख लिया |


सीता जी वहां मिलीं कहीं ना

तब दिखा महल एक सुन्दर

भगवाण का मंदिर भी उसमें था

सोचें, संत रहे कोई अंदर |


तभी विभीषण जाग गए थे

उच्चारण किया राम नाम का

सुन कर मन में हर्ष बहुत हुआ

रूप धरा फिर एक ब्राह्मण का |


हनुमान पुकारें विभीषण को

वो उनको प्रणाम करें

विभीषण पूछें, आप राम भक्त हैं

या प्रत्यक्ष में राम खड़े |


हनुमान परिचय देकर अपना कहें

करूँ, राम जो काम कहें

विभीषण बोले, मैं यहाँ रहता

जैसे जीभ दाँतों में रहे |


आप संत मुझको मिले हैं

कृपा राम की भी पाऊं क्या

हनुमान कहें मेरे प्रभु तो

प्रेम करें सेवक से सदा |


मैं कुलीन चञ्चल एक वानर

उनका प्रिय सेवक बन पाया

विभीषण ने हनुमान जी को तब

सीता जी का पता बताया |


अशोकवन में पहुँच गए कपि

मसक सरीखा रूप धरा 

सीता जी को देखा था जब

मन में उनको प्रणाम किया |


सीता लगतीं बहुत दुखी थीं

लटा जटाओं की थी सरपर

स्मरण करें प्रभु को ह्रदय में

दुखी हुए कपि उनको देखकर |


उसी समय वहां रावण आया

कहे सीता तुम हाँ करो बस

रानी सब तेरी दासी हों

भय दिखाए, हँसे अभिमान वश |


सीता बोलीं सुन दुष्ट तूं

राम जैसे सूर्य भगवान

और उनके सामने तू है

सिर्फ एक जुगनू समान |


क्रोध आया रावण को सुनकर

कहे, सजा मिलेगी अपमान की

तलवार से मैं सर काट लूँ तेरा

नहीं परवाह क्या अपनी जान की |


मंदोदरी ने जब समझाया

राक्षसीओं को उसने बोला तब

भय दिखलाओ सीता को तुम

न माने, मारूं मैं आऊं जब |


राक्षसी ज्ञानी एक त्रिजटा

सीता पर रहम आया

बाकी सीता को भय दिखावें

उसने सबको एक स्वपन सुनाया |


एक बन्दर, जला दी सब लंका

राक्षस सेना मर कट जाये

रावण नंगा, सर मुंडा हुआ

कटी उसकी सारी भुजाएं |


दक्षिण दिशा, यमपुरी जा रहा

लंका विभीषण ने पाई

सच होगा ये कुछ दिनों में

सुन कर सब की शामत आई |


गिर पड़ीं सब सीता चरणों में

सीता त्रिजटा से ये बोलीं

तू मेरी सखी है विपत्ति में

पर जी न पाऊं मैं अकेली |


मन करता है जान मैं दे दूँ

राम विरह सह न पाऊँ

मन व्याकुल ह्रदय में जलन है

तुम को मैं कैसे बतलाऊं |


त्रिजटा समझाया सीता को

प्रताप राम का उन्हें सुनाया

चली गयी त्रिजटा वहां से

सीता सोचे प्रभु उन्हें भुलाया |


हनुमान अंगूठी डाली वहां

हाथ में लिया सीता ने उसे

पहचानी अंगूठी,फिर वो सोचें

कोई रच ना सके माया से इसे |


मधुर वचन कपि बोले तब

उनको थी सब कथा सुनाई

सीता कहें, तुम प्रकट हो अभी

पास आये हनुमान गोसाईं |


उन्हें देख आश्चर्य करें सीता

कपि कहें मेरे स्वामी हैं रघुवर

निशानी के लिए दी ये अंगूठी

विश्वास हुआ सीता को उनपर |


हनुमान को पूछें सीता

क्या राम मुझे याद हैं करते

कहीं भुला न दिया हो मुझको

आँख में उनके आंसू भरते |


कोमल वचन बोलें हनुमान जी

दिल छोटा मत करो हे माता

उनके ह्रदय में इतना प्रेम है

ध्यान तुम्हारा कभी न जाता |


राम कहा मुझे, बताना सीता को

वियोग में सब प्रतिकूल हो गया

रात्रि कालरात्रि सामान है

फूल भी जैसे शूल हो गया |


सुन्दर ये सब बातें सुनकर

जानकी प्रेम में मग्न हो गयीं

दें आशीष वो हनुमान को

शरीर की सुद्बुध उनको न रही |


हनुमान कहें सुनो हे माता

राक्षस तो पतंगे समान हैं

ये सब अब जले ही समझो

अग्नि जैसे राम बाण हैं |


ले जाऊं आपको अभी यहाँ से

पर राम की आज्ञा नहीं है मुझको

धीरज धरलो, वानरों सहित फिर

आएंगे रामजी लेने तुमको |


सीता कहें, वानर तो छोटे

होंगे जैसे, तुम हो छोटे

राक्षस तो बलवान बहुत हैं

दुष्ट हैं ये और मन के खोटे |


मन में मेरे संदेह बहुत है

वो इनसे जीतेंगे कैसे

हनुमान विशाल हो गए

पर्वत सुमेरु के जैसे |


सीता को विश्वास हुआ

छोटा रूप धारण किया तब

सीता कहें तुम अजर अमर रहो

प्रभु भक्ति का वर दिया तब |


हनुमान कहें भूख लगी माँ

फल खाने की इच्छा है मुझे

सीता कहें रखवाली करते

योद्धा बहुत हैं, मारेंगे तुझे |


भय उनका मुझे नहीं है

बस आज्ञा आप मुझे दो

आज्ञा ले घुस गए बाग में

फल खाएं, तोड़ें वृक्षों को |


कुछ रखवालों को था मारा

कुछ गए रावण के पास

कहें भयंकर बन्दर एक आया

अशोक वाटिका का किया विनाश |


 










 









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