रामायन ३७;सीता हनुमान मिलाप
रामायन ३७;सीता हनुमान मिलाप
छोटा रूप धरा हनुमान ने
नगर में तब प्रवेश किया
महल महल ढूंढें सीता को
रावण को भी वहां देख लिया |
सीता जी वहां मिलीं कहीं ना
तब दिखा महल एक सुन्दर
भगवाण का मंदिर भी उसमें था
सोचें, संत रहे कोई अंदर |
तभी विभीषण जाग गए थे
उच्चारण किया राम नाम का
सुन कर मन में हर्ष बहुत हुआ
रूप धरा फिर एक ब्राह्मण का |
हनुमान पुकारें विभीषण को
वो उनको प्रणाम करें
विभीषण पूछें, आप राम भक्त हैं
या प्रत्यक्ष में राम खड़े |
हनुमान परिचय देकर अपना कहें
करूँ, राम जो काम कहें
विभीषण बोले, मैं यहाँ रहता
जैसे जीभ दाँतों में रहे |
आप संत मुझको मिले हैं
कृपा राम की भी पाऊं क्या
हनुमान कहें मेरे प्रभु तो
प्रेम करें सेवक से सदा |
मैं कुलीन चञ्चल एक वानर
उनका प्रिय सेवक बन पाया
विभीषण ने हनुमान जी को तब
सीता जी का पता बताया |
अशोकवन में पहुँच गए कपि
मसक सरीखा रूप धरा
सीता जी को देखा था जब
मन में उनको प्रणाम किया |
सीता लगतीं बहुत दुखी थीं
लटा जटाओं की थी सरपर
स्मरण करें प्रभु को ह्रदय में
दुखी हुए कपि उनको देखकर |
उसी समय वहां रावण आया
कहे सीता तुम हाँ करो बस
रानी सब तेरी दासी हों
भय दिखाए, हँसे अभिमान वश |
सीता बोलीं सुन दुष्ट तूं
राम जैसे सूर्य भगवान
और उनके सामने तू है
सिर्फ एक जुगनू समान |
क्रोध आया रावण को सुनकर
कहे, सजा मिलेगी अपमान की
तलवार से मैं सर काट लूँ तेरा
नहीं परवाह क्या अपनी जान की |
मंदोदरी ने जब समझाया
राक्षसीओं को उसने बोला तब
भय दिखलाओ सीता को तुम
न माने, मारूं मैं आऊं जब |
राक्षसी ज्ञानी एक त्रिजटा
सीता पर रहम आया
बाकी सीता को भय दिखावें
उसने सबको एक स्वपन सुनाया |
एक बन्दर, जला दी सब लंका
राक्षस सेना मर कट जाये
रावण नंगा, सर मुंडा हुआ
कटी उसकी सारी भुजाएं |
दक्षिण दिशा, यमपुरी जा रहा
लंका विभीषण ने पाई
सच होगा ये कुछ दिनों में
सुन कर सब की शामत आई |
गिर पड़ीं सब सीता चरणों में
सीता त्रिजटा से ये बोलीं
तू मेरी सखी है विपत्ति में
पर जी न पाऊं मैं अकेली |
मन करता है जान मैं दे दूँ
राम विरह सह न पाऊँ
मन व्याकुल ह्रदय में जलन है
तुम को मैं कैसे बतलाऊं |
त्रिजटा समझाया सीता को
प्रताप राम का उन्हें सुनाया
चली गयी त्रिजटा वहां से
सीता सोचे प्रभु उन्हें भुलाया |
हनुमान अंगूठी डाली वहां
हाथ में लिया सीता ने उसे
पहचानी अंगूठी,फिर वो सोचें
कोई रच ना सके माया से इसे |
मधुर वचन कपि बोले तब
उनको थी सब कथा सुनाई
सीता कहें, तुम प्रकट हो अभी
पास आये हनुमान गोसाईं |
उन्हें देख आश्चर्य करें सीता
कपि कहें मेरे स्वामी हैं रघुवर
निशानी के लिए दी ये अंगूठी
विश्वास हुआ सीता को उनपर |
हनुमान को पूछें सीता
क्या राम मुझे याद हैं करते
कहीं भुला न दिया हो मुझको
आँख में उनके आंसू भरते |
कोमल वचन बोलें हनुमान जी
दिल छोटा मत करो हे माता
उनके ह्रदय में इतना प्रेम है
ध्यान तुम्हारा कभी न जाता |
राम कहा मुझे, बताना सीता को
वियोग में सब प्रतिकूल हो गया
रात्रि कालरात्रि सामान है
फूल भी जैसे शूल हो गया |
सुन्दर ये सब बातें सुनकर
जानकी प्रेम में मग्न हो गयीं
दें आशीष वो हनुमान को
शरीर की सुद्बुध उनको न रही |
हनुमान कहें सुनो हे माता
राक्षस तो पतंगे समान हैं
ये सब अब जले ही समझो
अग्नि जैसे राम बाण हैं |
ले जाऊं आपको अभी यहाँ से
पर राम की आज्ञा नहीं है मुझको
धीरज धरलो, वानरों सहित फिर
आएंगे रामजी लेने तुमको |
सीता कहें, वानर तो छोटे
होंगे जैसे, तुम हो छोटे
राक्षस तो बलवान बहुत हैं
दुष्ट हैं ये और मन के खोटे |
मन में मेरे संदेह बहुत है
वो इनसे जीतेंगे कैसे
हनुमान विशाल हो गए
पर्वत सुमेरु के जैसे |
सीता को विश्वास हुआ
छोटा रूप धारण किया तब
सीता कहें तुम अजर अमर रहो
प्रभु भक्ति का वर दिया तब |
हनुमान कहें भूख लगी माँ
फल खाने की इच्छा है मुझे
सीता कहें रखवाली करते
योद्धा बहुत हैं, मारेंगे तुझे |
भय उनका मुझे नहीं है
बस आज्ञा आप मुझे दो
आज्ञा ले घुस गए बाग में
फल खाएं, तोड़ें वृक्षों को |
कुछ रखवालों को था मारा
कुछ गए रावण के पास
कहें भयंकर बन्दर एक आया
अशोक वाटिका का किया विनाश |
