रामाश्रम।
रामाश्रम।
दीन दयालु तुम हो प्रभु, दाता अपरंपार।
छल कपट जिसने है त्यागा, कर दिया बेड़ा पार ।।
अज्ञानता के बादल छाए मन में, कर रहा करुण पुकार।
कृपा दृष्टि जो तुमने फेरी, करके मुझसे प्यार।।
किस-किस रूप में आए फिर भी, कर न सका दीदार।
तुम कृपालु इतने ठहरे, सदा करते रहे उद्धार।।
मैं मूढ़मति समझ न पाया, तुम बिन सूना संसार।
ज्ञान चक्षु जब तुमने खोले, जाना जगत का सार।।
मझधार बीच फँसी मेरी नैया, कैसे होवै पार।
वाँह गहि मेरी सतगुरु ने लीनी, कर दिया भव से पार।।
लिप्त हुआ संसार में एसे, किया न कुछ भी उपकार।
सत्संग सुधा रस तुमने देकर, जीवन किया साकार।।
क्या है जीवन, कितना जीवन, क्या है जगत का आधार।
"नीरज" "रामाश्रम" को पाकर, करता विनती बारम्बार।।
