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राहुल द्विवेदी 'स्मित'

Inspirational

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राहुल द्विवेदी 'स्मित'

Inspirational

राखी

राखी

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राखी को  धागों की  कोरी, परिभाषा मत मानो तुम ,

छुपे हुए कितने अहसासों,  के सागर  पहचानो  तुम ।

रोली कुमकुम थाल सजाकर, पास तुम्हारे आऊँ जब ।

भैया उस पल मन में अपने , एक वचन को ठानो तुम..,

राखी को ............!!


कल सरहद पर  सुना लुटी , कितने अरमानों  की डोली ।

एक वतन की  एक बहन की,  रो बैठी  खाली  झोली ।

सिसक सिसक कर कहना चाहें, उन आँखों के कुछ मोती ।

कौन सुनेगा  क्या कहती हैं,  चीख-चीख अँखियाँ रोती ।

कुछ पल उस बहना के गम को अपने गम सा जानो तुम......

राखी को............!!


अभी अभी दो लावारिस भी, आये थे घर में अपने ।

पूंछ  रहे थे  किसने लूटे,  उन मासूमों  के सपने ।

रोज रात को खाली घर में, बिन खाए ही  सोते हैं ।

उनको कहाँ पता अपने भी, इस दुनिया में होते हैं ।

जरा देख कर मासूमों में, खुद को भी पहचानो तुम ,

राखी को..............!!


बस राखी  का नाम कलाई,  तक ही  मत रहने देना ।

नहीं  किसी  दुखियारे मन  को, लाचारी सहने देना ।

अहसासों के इन धागों को, हर दिल तक पहुँचाना तुम ।

खूब नेकियों  की खुशबू से, धरती को  महकाना तुम ।

यहीं वचन बस यहीं प्रतिज्ञा राखी के दिन ठानो तुम ....,

राखी को..............!!


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