राखी
राखी
राखी को धागों की कोरी, परिभाषा मत मानो तुम ,
छुपे हुए कितने अहसासों, के सागर पहचानो तुम ।
रोली कुमकुम थाल सजाकर, पास तुम्हारे आऊँ जब ।
भैया उस पल मन में अपने , एक वचन को ठानो तुम..,
राखी को ............!!
कल सरहद पर सुना लुटी , कितने अरमानों की डोली ।
एक वतन की एक बहन की, रो बैठी खाली झोली ।
सिसक सिसक कर कहना चाहें, उन आँखों के कुछ मोती ।
कौन सुनेगा क्या कहती हैं, चीख-चीख अँखियाँ रोती ।
कुछ पल उस बहना के गम को अपने गम सा जानो तुम......
राखी को............!!
अभी अभी दो लावारिस भी, आये थे घर में अपने ।
पूंछ रहे थे किसने लूटे, उन मासूमों के सपने ।
रोज रात को खाली घर में, बिन खाए ही सोते हैं ।
उनको कहाँ पता अपने भी, इस दुनिया में होते हैं ।
जरा देख कर मासूमों में, खुद को भी पहचानो तुम ,
राखी को..............!!
बस राखी का नाम कलाई, तक ही मत रहने देना ।
नहीं किसी दुखियारे मन को, लाचारी सहने देना ।
अहसासों के इन धागों को, हर दिल तक पहुँचाना तुम ।
खूब नेकियों की खुशबू से, धरती को महकाना तुम ।
यहीं वचन बस यहीं प्रतिज्ञा राखी के दिन ठानो तुम ....,
राखी को..............!!
