STORYMIRROR

AJAY AMITABH SUMAN

Tragedy

3  

AJAY AMITABH SUMAN

Tragedy

राख़

राख़

1 min
420

जाके कोई क्या पूछे भी,

आदमियत के रास्ते।

क्या पता किन किन हालातों,

से गुजरता आदमी।


चुने किसको हसरतों ,

जरूरतों के दरमियाँ।

एक को कसता है तो,

दूजे से पिसता आदमी।


ज़ोर नहीं चल रहा है,

आदतों पे आदमी का।

बाँधने की घोर कोशिश

और उलझता आदमी।


गलतियाँ करना है फितरत,

कर रहा है आदतन ।

और सबक ये सीखना कि,

दुहराता है आदमी।


वक्त को मुट्ठी में कसकर,

चल रहा था वो यकीनन,

पर न जाने रेत था वो,

और फिसलता आदमी।


मानता है ख़्वाब दुनिया,

जानता है ख़्वाब दुनिया।

और अधूरी ख्वाहिशों का,

ख़्वाब  रखता आदमी।


आया ही क्यों जहान में,

इस बात की खबर नहीं,

इल्ज़ाम तो संगीन है,

और बिखरता आदमी।

"अमिताभ" इसकी हसरतों का,

क्या बताऊं दास्ताँ।

आग में जल खाक बनकर,

राख़ रखता आदमी।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy