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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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प्यास बरसने लगी हो

प्यास बरसने लगी हो

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कभी सुना नहीं था

कभी पढ़ा नहीं था कि

न बुझने वाली प्यास भी

बरस जाती है

इसलिए जब बरसने लगी

और भींगने लगा मैं तो

समझ में नहीं आता था कि

ये हो क्या रहा है

बहर हाल प्यास बरसती रही

मैं भींगता रहा 

रंगता रहा उसके रंग

भींगती रही मेरे आस पास की जमीन

सर से पांव तक गीला गीला

रंग ऐसा कि

कभी देखो मुझे तो नजरों का

फिसलना तय समझो

देखने का हुनर भी सीख गया में

प्यास की बारिश में भींगते भींगते

और मै देखता रहा 

फिसलती हुयी नजरों को

और लोग समझते रहे मैं तो

देख ही नहीं सकता

बहरहाल प्यास की बारिश का

सिलसिला जारी है

और अब पानी मेरे आस पास

रिस रहा है धीमे धीमें

और मेरा विश्वास हो चला है कि

प्यास बरस रही है

ये एक नया पनघट है

हर मौसम में भींगता हुआ

कभी भींगना हो प्यास की बारिश में

तो आना,देख लेना बारिश

और महसूस कर लेना

अपना भींगना

नया प्रेम था हमारा

और अब एक नया पनघट है हमारा।


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