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Asst. Pro. Nishant Kumar Saxena

Abstract

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Asst. Pro. Nishant Kumar Saxena

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पूर्व और पश्चिम की संस्कृति

पूर्व और पश्चिम की संस्कृति

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यह जो भारत में 

डे मनाने का चलन चला है ! 

मदर्स डे, फादर्स डे, सिस्टर डे, ब्रदर्स डे, 

फ्रेंडशिप डे, वेलेंटाइन डे, हग डे, रोज डे

मैरिज डे, सिल्वर जुबली डे,गोल्डन जुबली डे 

डे डे डे ! 


हमारी संस्कृति नहीं है। 

हमारी संस्कृति में प्रतिदिन मां बाप 

भाई बहन, पत्नी और मित्र का दिन होता है ! 


हमारी संस्कृति में 

अपने परिवार समाज और राष्ट्र के लिए

जीने का हर दिन होता है ! 

रोज उनकी सेवा और रोज उनके प्रति

अपने कर्तव्य को निभाना होता है !


वे सब तो उन देशों के चलन हैं ! 

जहां पर औलाद सोलह वर्ष की हो तो

मां-बाप को सूरत नहीं दिखाती।

मां-बाप वृद्ध केंद्रों में पड़े रहते हैं और

औलाद को उनकी कोई चिंता नहीं सताती।

उन्हें याद दिलाया जाता है कि आज फलां डे है

जाकर अपने बाप से वृद्ध आश्रम में मिलआओ !


प्रेम हमारी की आत्मा में बसता है।

शरीर और वासना में नहीं।

हम रिश्तों का दिखावा नहीं करते।

दिल से निभाना जानते हैं बातों से नहीं।

कम से कम यह उनसे तो ना ही सीखें 

जो कपड़ों की तरह पति पत्नी बदलते हैं।


आज फ्रेंडशिप होती है। कल बदचलन होते हैं

और परसों किसी और के लिए मचलते हैं। 

लड़के-लड़के और 

लड़कियों-लड़कियों की फ्रेंडशिप तो 

गे और लैसबियन संबंधों तक पहुंच जाती है।

फिर भी ना जाने उनमें दुनिया को ऐसी क्या खासियत नजर आती है।


कृष्ण सुदामा की मित्रता से बढ़कर फ्रेंड शिप कहीं नहीं।

तीन मुट्ठी चावल और सर्वस्व दान

ऐसा है मेरा भारत देश महान।

हमारा जितना प्रेम अपनों से होता है

उससे अनंत गुना मातृभूमि से होता है।


मैरिज डे आपको शहीदों की वे वीरांगना सिखाएंगी

सुहाग की सेज से जाकर जिनके पति देश रक्षा में शहीद हो गए।

फिर भी वे खुश हैं। पति पर गर्व है उन्हें।

भले ही उनके ताउम्र सावन वतन पर निसार हो गए।


जागो भारतीय

मातृ देवो भव 

पितृ देवो भव 

आचार्य देवो भव 

गुरुर साक्षात परम ब्रह्म 

अतिथि देवो भव 

ऐसी संस्कृति कहीं नहीं।।


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