End of Summer Sale for children. Apply code SUMM100 at checkout!
End of Summer Sale for children. Apply code SUMM100 at checkout!

Archana Verma

Abstract


5.0  

Archana Verma

Abstract


पथिक की प्रकृति

पथिक की प्रकृति

1 min 479 1 min 479

मेरी छाँव मे जो भी पथिक आया

थोडी देर ठहरा और सुस्ताया।

मेरा मन पुलकित हुआ हर्षाया

मैं उसकी आवभगत में झूम झूम लहराया। 


मिला जो चैन उसको

दो पल मेरी पनाहों में

उसे देख मैं खुद पर इठलाया।

वो राहगीर है अपनी राह पे

उसे कल निकल जाना

ये भूल के बंधन मेरा उस से गहराया।


बढ़ चला जब अगले पहर वो

अपनी मंज़िलो की ऒर

ना मुड़ के उसने देखा न आभार जतलाया

मैं तकता रहा उसकी बाट अक्सर

एक दिन मैंने खुद को समझाया।


मैं तो पेड़ हूँ मेरा काम है छाँव देना

फिर भला मैं उस पथिक के

बर्ताव से क्यों मुरझाया

ये सोच मैं फिर खिल उठा

और झूम झूम लहराया।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Archana Verma

Similar hindi poem from Abstract