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Archana Verma

Abstract

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Archana Verma

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पथिक की प्रकृति

पथिक की प्रकृति

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मेरी छाँव मे जो भी पथिक आया

थोडी देर ठहरा और सुस्ताया।

मेरा मन पुलकित हुआ हर्षाया

मैं उसकी आवभगत में झूम झूम लहराया। 


मिला जो चैन उसको

दो पल मेरी पनाहों में

उसे देख मैं खुद पर इठलाया।

वो राहगीर है अपनी राह पे

उसे कल निकल जाना

ये भूल के बंधन मेरा उस से गहराया।


बढ़ चला जब अगले पहर वो

अपनी मंज़िलो की ऒर

ना मुड़ के उसने देखा न आभार जतलाया

मैं तकता रहा उसकी बाट अक्सर

एक दिन मैंने खुद को समझाया।


मैं तो पेड़ हूँ मेरा काम है छाँव देना

फिर भला मैं उस पथिक के

बर्ताव से क्यों मुरझाया

ये सोच मैं फिर खिल उठा

और झूम झूम लहराया।


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