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Om Prakash Fulara

Abstract

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Om Prakash Fulara

Abstract

प्रतिस्पर्धा

प्रतिस्पर्धा

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प्रतिस्पर्धा करो

किससे ?

किसी और से नहीं

बल्कि खुद से,


समय पहचानो

खुद को जानो

विचार करो

कहाँ खड़े हो

क्या है ठिकाना


कहाँ तक है जाना ?

प्रतिस्पर्धा वही होती है

जो हो खुद से

किसी और से नहीं।


प्रतिस्पर्धा हो

अपने कल, आज और

कल के बीच

पन्ने पलटो जीवन के

देखो अपना अतीत

कहाँ थे ?

सोचो आज कहाँ हो?

कल कहाँ जाना है?


दुनिया गोल है

नहीं कोई कोना

दुनिया की भीड़ में

नहीं है खोना

कर्म जो कल किया

क्या सार्थक हुआ ?


विचार करो परिणाम पर

क्या आज सुरक्षित है ?

कल उज्ज्वल होगा ?

नहीं तो फिर ढूँढो कमी

कहाँ रह गई ?


प्रतिस्पर्धा हो

अपने ही कल के कर्म से

मिलेगी मंजिल

उज्ज्वल जीवन

सुख वैभव सम्पन्न।


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