प्रतिस्पर्धा
प्रतिस्पर्धा
प्रतिस्पर्धा करो
किससे ?
किसी और से नहीं
बल्कि खुद से,
समय पहचानो
खुद को जानो
विचार करो
कहाँ खड़े हो
क्या है ठिकाना
कहाँ तक है जाना ?
प्रतिस्पर्धा वही होती है
जो हो खुद से
किसी और से नहीं।
प्रतिस्पर्धा हो
अपने कल, आज और
कल के बीच
पन्ने पलटो जीवन के
देखो अपना अतीत
कहाँ थे ?
सोचो आज कहाँ हो?
कल कहाँ जाना है?
दुनिया गोल है
नहीं कोई कोना
दुनिया की भीड़ में
नहीं है खोना
कर्म जो कल किया
क्या सार्थक हुआ ?
विचार करो परिणाम पर
क्या आज सुरक्षित है ?
कल उज्ज्वल होगा ?
नहीं तो फिर ढूँढो कमी
कहाँ रह गई ?
प्रतिस्पर्धा हो
अपने ही कल के कर्म से
मिलेगी मंजिल
उज्ज्वल जीवन
सुख वैभव सम्पन्न।
