प्रतिभा
प्रतिभा
नाना भाँति प्रतिभा के, दृष्टिगोचर होते जग में
सरवर, तरूवर और कपोलों में
तेजवान भानु से, प्रकाशवान भूमंडल
स्वयं के बल से करता जगत दैदीप्यमान
धीरे-धीरे रात्रि का जब हुआ आगमन
नभ पर निशा का हुआ आक्रमण
आ व्योम में शशि ने अपना मान बढ़ाया
प्रेमी- प्रेमिकाओं के मन में अति हर्षाया
भूमि पटल में तेज, विविध, विभिन्न रूपों में आया
निर्जन वन में निर्झर खींच लेते ध्यान अनायास
बढ़ते कदमों को ठिठकाने का करते प्रयास
उपवन की शोभा रंग-बिरंगे फूलों से
पथिक को भी बाँध देती मोहपाश से
गायन वादन और नूपुर की झंकार
प्रतिभावान करते, इनसे अपनी पहचान
रचा बसा संसार है, जगत सारा दैदीप्यमान
देख स्वर्ग से ईश्वर भी, प्रसन्न होता बारंबार
कहीं लताएँ लिपटी वृक्षों से, कहीं चादर ओढ़ी नदियों ने
ऊँचे पर्वत गगनचुंबी, दिए कई विश्व आरोहण
संसार करता उनको नतमस्तक
समेटता रहस्य समुद्र गहरा
सीप में मोती देता अति सुंदर
आकर्षण का केन्द्र रहा, सदा जग का कण-कण
प्रतिभा का लौह मानते पल -पल।
