प्रकृति
प्रकृति
सुबह की कभी सूरज की लाली में, कभी शाम की हरियाली,
तो कभी रात के अंधेरे की चांदनी में चाँद सी सुंदर लगती प्रकृति हमारी,
चार ऋतु के खेल में हर मौसम में खिलखिलाती रहती प्रकृति हमारी,
सबको प्यारा लगे हरा भरा उपवन,
बहती झील का शीतल पानी, बलखाती नदियां का बहना,
चिड़िया की चहक, फूलों की महक,
समुद्र लहरों का उमड़ना तो कभी पहाड़ों का सन्नाटा,
हर स्थिति परिस्थिति में मन मोह लेती प्रकृति हमारी,
जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, और आकाश से बनी यह सुंदर प्रकृति हमारी,
दिन रात निस्वार्थ अपने पर निछावर करती रहती प्रकृति हमारी,
पर प्रकृति बिलक कहती,
हे मानव तुम मुझसे ही हो (पांच तत्वों), मैं तुझ में हूँ ,
हमें काटने, उजाड़ने, पतझड़ हो सुखा होने से बचाओ,
यह मानव में मानवता जगाती रहती प्रकृति,
जहाँ जगह हो पेड़ प्रयास कर लगाओ, निवेदन से कहती
प्रकृति हमारी, प्रकृति में हरियाली जितनी
उतने ही स्वस्थ कुशल हम होंगे कहती प्रकृति हमारी ।।
