प्रकृति
प्रकृति
जहाँ मानव के पैर थमे
पशुओं की हुंकार हुई
नीड़ नष्ट कर पशुओं के
मानव तूने प्रगती की
खुद को भगवान
समझ रहा था मानव
बेबस आज वो खुद है
छिन जमीं मुक पशुओं की
आज घरों में खुद बन्द है
पशुओं की चीत्कार सुन
प्रकृती ने भी करवट बदली
आजाद हो आज प्राणी घूम रहे
घूम इंसानों की आजादी हुई
बन्द पिंजरों में पशुओं के हालात की
आज जरा सी पहचान हुई
धरा, आसमां सब कह रहे
प्रकृति मानव से बलवान हुई।
