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Dr. Trisha nidhi

Abstract

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Dr. Trisha nidhi

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प्रकृति की निराशा

प्रकृति की निराशा

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यह जो है आजकल की पीढ़ी 

वास्तव में है स्वतंत्र 

या है केवल पावों की बेड़ी !

काम में सभी व्यस्त 

है कितने ?


प्रगति के पथ पर दौड़ लगा रहे हैं

रुकने का समय किसके पास है ?

हम तो प्रगति की मिसाल है। 

सोच है नहीं यह गलत कोई 

पर क्या सोचा है कभी तुमने 

क्या खो चुके हो तुम 

अपने जीवन में ?


उस पेड़ की नीव को हिलाया है तुमने 

कभी छाया जिसने प्रदान किया

उस कली को खिलने का मौका ही न दिया 


कभी तुम्हें जिसने हँसाया

उस भवरें की भिनभिनाहट को चुप कराया तुमने 

पराग की मिठास को जिसने पिरोया था

उस मचलती नदी को रोक दिया तुमने 

जिसने बिना रुके चलना सिखाया था। 

 

प्रकृति के आंसू 

अनसुना कर दिया तुमने

इनसे जब बाढ़ आती है 

क्रोध का शिकार तुम्हें तो बनाती है 

कुछ भीषण आग में 


तो कुछ प्रदुषण के चपेट में

ऐसी खबरे सुना जाती है। 

वक्त है अभी सुधर जाओ 

क्या पता आक्रोश के सागर में 

हमेशा के लिए समां जाओ। 


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