प्रकृति हूँ मैं
प्रकृति हूँ मैं
ईश्वर की कृति हूँ मैं;
स्वर्ग की आवृति हूँ मैं;
जीवनचक्र की सच्ची कहानी कह रहीं हूँ मैं..
प्रकृति हूँ मैं, हाँ प्रकृति हूँ मैं !
प्रेम की आकृति हूँ मैं;
धरनी की संस्कृति हूँ मैं;
ममता की मूरत बन सब कुछ सह रही हूँ मैं..
प्रकृति हूँ मैं, हाँ प्रकृति हूँ मैं !
गुमनाम की स्मृति हूँ मैं;
विनाश की विकृति हूँ मैं;
प्रलय का रूप में स्वयं ही दह रहीं हूँ मैं..
प्रकृति हूँ मैं, हाँ प्रकृति हूँ मैं !
बदलाव की स्वीकृति हूँ मैं;
सौन्दर्य की आंलकृति हूँ मैं;
हर रूप में नया स्वरूप लेकर बह रही हूँ मैं..
प्रकृति हूँ मैं, हाँ प्रकृति हूँ मैं !
