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V. Aaradhyaa

Romance

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V. Aaradhyaa

Romance

प्रेममय हूँ मैं

प्रेममय हूँ मैं

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तुमसे कुछ कहूँ तो तुम सुन नहीं पाओगे,

मेरे अंतस का दर्द तुम नहीं समझ पाओगे !


मैं जिस वक्त तुम्हारे प्रेम में रहा करती थी,

उस वक़्त मैं सब कुछ भूल जाया करती थी !


तब नहीं सोच पाती थी कि, कल क्या होगा,

वक्त बदलता है,और ये वक़्त सदा नहीं रहेगा !


बस गए थे तुम मेरे ह्रदय में कहीं बेहद गहरे,

हुए मनमीत के सदृश प्रेमसिक्त तो लगे पहरे !


फिर प्रेमी से आगे हो गए तुम सबसे बढ़कर,

और फिर मैंने पूछा कि क्या तुम बनोगे सहचर !


प्रेममय हूँ मैं... मेरी तरह प्रेममय होगे तुम भी,

किंचित अलग नहीं एक दूसरे से हम दोनों भी !


याद रहा वह पेड़ जिसके नीचे कभी हम मिले,

चाँदनी छितराई,पूनम की रात दोनों के मन मिले !


सतह पर तिर आईं सारी यादें उस समागम की ,

सूरज की उष्ण तपिश की तरह थे हमारे तन जले !


पर..मेरे प्रणय सूत्र की गहराई तुम नहीं नाप सके,

सागर तल से क्षितिज के पार से उस पार नहीं जा सके !


तुमने प्रेम किया होता तो समझते कि,प्रेम गया कहाँ गुम,

तुम ना डूबे गहराई में और चले गए, अंततः उथले ही रहे तुम !



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