प्रेममय हूँ मैं
प्रेममय हूँ मैं
तुमसे कुछ कहूँ तो तुम सुन नहीं पाओगे,
मेरे अंतस का दर्द तुम नहीं समझ पाओगे !
मैं जिस वक्त तुम्हारे प्रेम में रहा करती थी,
उस वक़्त मैं सब कुछ भूल जाया करती थी !
तब नहीं सोच पाती थी कि, कल क्या होगा,
वक्त बदलता है,और ये वक़्त सदा नहीं रहेगा !
बस गए थे तुम मेरे ह्रदय में कहीं बेहद गहरे,
हुए मनमीत के सदृश प्रेमसिक्त तो लगे पहरे !
फिर प्रेमी से आगे हो गए तुम सबसे बढ़कर,
और फिर मैंने पूछा कि क्या तुम बनोगे सहचर !
प्रेममय हूँ मैं... मेरी तरह प्रेममय होगे तुम भी,
किंचित अलग नहीं एक दूसरे से हम दोनों भी !
याद रहा वह पेड़ जिसके नीचे कभी हम मिले,
चाँदनी छितराई,पूनम की रात दोनों के मन मिले !
सतह पर तिर आईं सारी यादें उस समागम की ,
सूरज की उष्ण तपिश की तरह थे हमारे तन जले !
पर..मेरे प्रणय सूत्र की गहराई तुम नहीं नाप सके,
सागर तल से क्षितिज के पार से उस पार नहीं जा सके !
तुमने प्रेम किया होता तो समझते कि,प्रेम गया कहाँ गुम,
तुम ना डूबे गहराई में और चले गए, अंततः उथले ही रहे तुम !

