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ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

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प्रेम

प्रेम

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कह गए हैं कबीर जिसे, ढाई आखर...

जानते भी नहीं हैं लोग उसे पाकर....

ढूंढ़ते हैं उसे, कस्तूरी की तरह दुनिया में....

पर, होता है छुपा वो, अन्तस् में,

अहसासों के बहते दरिया में.....


मुस्कुराता है वो, माँ के आँचल में,

दोस्ती के जज़्बे में, चहकता है,

कुछ अनजाने नातों में,

बनकर खुशबू, महकता है.....

इंसानियत में, रंगों की तरह बिखरता और सँवरता है,

प्रेमियों के दिल में,

ज़िन्दगी बन कर धड़कता है.....


पर, रखना सदा ये याद कि,

परखने से प्रेम मुरझा जाता है,

शर्तों और वादों से कुम्हला जाता है....

जहाँ भरोसे और विश्वास का राज हो,

सिर्फ वहीं प्रेम ठहरता है....

होता है छुपा वो, अन्तस् में,

अहसासों के दरिया में बहता है.....



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