पंच-अगिन्याँ।
पंच-अगिन्याँ।
क्रोध रूपी अग्नि है ऐसी, तन- मन का करती विनाश।
जीवन नर्क से बदतर होता, कर देती इसको संत्रास।।
विचलित हो हृदय धड़कता, भावों में होता परिवर्तन।
अमूल्य जीवन धूमिल हो जाता, नाश कर देती उसका जीवन।।
काम-वासना इस कदर है बढ़ती, खो देता बुद्धि औ विवेक।
लोक- लाज की खबर नहीं, स्वतः झेलता दु:ख अनेक।।
उद्विग्न हृदय ऐसों का होता, अवसाद ग्रसित जीवन है कटता।
बिफरते मन के भावों को, प्रयास करके भी रोक न पाता।।
द्वेष भावना जीने नहीं देती, छीन रहा खुद अपना चैन।
तिरोहित करता सुख संपत्ति का, अहोरात्र करता उसको बेचैन।।
बिन सोच-समझ जो ईर्ष्या करते, भोग रहे हैं दु:ख संताप।
उत्पीड़न करना अपनी शान समझते, बढ़ा रहा निज अपने पाप।।
काम-क्रोध-ईर्ष्या और द्वेष, चिंता बनी अंतर के दोष।
समर्पित कर जो गुरु शरण पहुंचता, मिलता उसको परम संतोष।।
बड़े भाग मानुष तन जो पाता, और करता गुरु का सत्संग।
भाव हृदय के निर्मल बनते, दिखते असली जीवन के रंग।।
धन्य-धन्य हैं ऐसे सतगुरु, अमृतवाणी का देते संदेश।
"नीरज" विवेक तू जागृत कर ले, धारण कर ले गुरु- उपदेश।।
