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Dr. A. Zahera

Classics Inspirational Others

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Dr. A. Zahera

Classics Inspirational Others

पल वो प्यारे!!

पल वो प्यारे!!

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वो आज मेरा जब मांज़ी से मेरे यकायक मिलने चला

उसे बे-ख़्याल अल्हड़ सा इक गुज़रा हुआ कल दिखा।

हंसता खिलखिलाता लापरवाह सा झूमता हुआ 

उन पुरानी गलियों में उसे मेरा प्यारा सा बचपन मिला।

साथ ही सुख, चैन और अमन का बसेरा भी था दिखा।


कुछ बातें मिलीं, वहां ठहरी हुई कुछ यादें भी मिलीं।

गली के कोने में उसे आम अमरूद के बड़े बगीचे के

पेड़ों से झांकते हुए कुछ नन्हे से चंचल पल भी दिखे।

गुज़रे उन पल में दोस्तों संग छुप्पन छुपाई, लंगड़ी,

फुगड़ी, दौड़म दौड़ाई खेलते हुए शोर भी सुनाई दिये।


गर्मी की दोपहरी में बर्फ़ के गोलों की ठंडी ठंडी चुस्की

आम की कैरी की खट्टी मीठी मस्ती भी महसूस हुई। 

शाम चूल्हे पे सिकती हुई रोटी की खुशबू भी मेहकीं।

रात में छत पर दादा दादी की कहानियों को सुनते 

राजा, रानी, देव, प्रेत और परियां भी दिखाई पड़ीं।


गलियों से होते हुए उसने जब घर के आंगन में झांका 

मां की ममता, बाबा की तरबियत का एक साया पाया।

इक मंज़र दीदी भैय्या संग बेख़ौफ नादानियों का दिखा

तो इक लम्हा बड़े एतियाद से स्कूल के बसते में 

अपने सुनहरे मुस्तकबिल को ढूंढता हुआ नज़र आया।


कल के गुज़रे लम्हों की खट्टी मीठी यादों को समेटे।

आज जब मेरे आज के हिस्से में फिर वापस लौटा 

तो हर लम्हा उसे तेज़ भागता हुआ सा नज़र आया।

वहीं रिश्तों का आपस में जुड़ाव ख़त्म होता सा

और ज़िदगी का रंग बेरंग होता हुआ नज़र आया।


मस्तिष्क में एक प्यारा सा खयाल तब लगा गुदगुदाने।

ज़िंदगी के कुछ फलसफे आज भी उतने ही हैं सादे

कुछ पल उसमे रिश्तों के घोलो और थोड़े से याराने।

फिर देखो मेरे आज बन जाओगे तुम कल जितने प्यारे

थोड़े बे-ख़्याल कुछ अल्हड़ से और थोड़े से बचकाने।



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