फ़ितरत
फ़ितरत
देखो !
फ़ितरत इनसान की,
करने बैठा जब
बातें इस जहां की,
कर देता एक-एक
किस्सा बयाँ औरों का,
छोटा बड़ा सब याद
रह रह कर उगल
देता है,
अगला पिछला सब
ज़हन में टँगा रहता है,
यादाश्त की खूँटी से उतार
किस्सों को कह
गमगीन हुआ करता है,
जहां की रुसवाइयों को
तराजू में तोल तोलकर
खुद की बेगुनाही
साबित कर रहा होता है,
इस तोहमत और
रुसवाइयों के कठघरे में
खुद के अक्ष को भुला देता है,
खुदा का बंदा कह कह
औरों पर इलजाम
लगाता रहता है,
वाह रे ! इन्सान तेरी फ़ितरत
औरों में हजारों,
मगर खुद में
एक भी कमी नज़र न आई।
