पौराणिक मित्रता
पौराणिक मित्रता
मित्रता के वर्णन में सदियों से जो नाम आता है ,
कभी कर्ण बन मित्र की ढाल खड़े तुम,
कभी कृष्ण के द्वार गरीब सुदामा जाता है।
जब मन घिरा हो आशंकाओं से अर्जुन का,
मित्र कृष्ण उपदेश से युद्ध जीतता है।
वनों वन भटके प्रभु राम जब भाई संग ,
मित्र सुग्रीव हनुमान से सीता की खोज कराता है ।
जाति धर्म न नर नारायण का भेद करती मित्रता ,
कृष्ण बिन शब्दों के सुन लेता द्रौपदी की विपदा।
न छल हो न मन में न हो ईर्ष्या का मैल ,
सच्ची मित्रता नहीं होती बच्चों का खेल ,
जो मुसीबत में साथ , वही परम मित्र कहलाता है ।
