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Sambardhana Dikshit

Abstract

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Sambardhana Dikshit

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नुमाइशी चांद

नुमाइशी चांद

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महबूब को बहलाने का जरिया हो तुम

मोहब्बत को पार करने का एक दरिया हो तुम

तुम्हें तो हर कोई लिखता है

तुमपे हर दिलदार अपनी जान छिड़कता है

अंधेरे में एक उज्ज्वल रोशनी हो तुम 

दीवाली के रात- सी ज़िन्दगी का जगमगाता दीया हो तुम

क्या लिखूं तुमपे, कैसे कहूं बातें

होती तो हैं तुमसे रोज़ मुलाकातें

मेरा सबकुछ तो तुम ही हो

तुम हर मौसम मेरे साथ जो हो

लिखती हूं तुमको नित नई खत

इसी आस में की कहीं मां तक पहुंच जाऊं

वो खूब बहलाती थी मुझे तुम्हें दिखाकर

वो बहुत हसाया करती थी मुझे तुमसे रूबरू कराकर

कहती थी वो चांद नहीं , वो तो मैं हूं

तुम आसमान के टुकड़े हो और मैं मां के दिल का टुकड़ा हूं

मां ना जाने कितनी बातें तुमसे करती थी 

पूछूं कभी तो कहती, "मैं उसमें खुद को ढूंढती हूं"

मैं हंस देती कुछ खिलखिला कर

पर अब सोचती हूं

मां वो रोशनी थी मेरे अंधेरे का जो तुम हो आसमान का, अब ये समझती हूं

मां भी पूर्णमासी चांद - सी ही थी

तुम जैसा घटकर अमावस से पूर्णिमा बनती थी

यूं ही एक दिन मां भी धीरे धीरे घटने लगी 

तुम तो फिर आए अगली पूर्णिमा को 

पर मां हमेशा के लिए अमावस की रात बन गई

छोड़ गई एक खत मेरे नाम लिखकर 

" लाडली, तू मेरे आंखों का सितारा, मैं उस चांद की चांदनी हूं,

दूर भले ही हूं तुझसे पर तेरे नजारों में हूं" ।

मैं तुम में हर रात मां को ढूंढती हूं

बस उस एक पल में हर पल के सुकून को समेट लेती हूं।

हे चांद ! क्या मेरी ख्वाहिश भी कभी पूरी होगी?

क्या मेरी मुलाकात फिर कभी मेरे नुमाइशी चांद से होगी?


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