बेटियां : नूर - ए - घर
बेटियां : नूर - ए - घर
बेटी विदा होकर भी कहाँ विदा हो पाती है,
माँ की हर चिंता में चुपके से लौट आती है।
फोन पे बस “मैं ठीक हूँ” कह जाती है,
पर आवाज़ उसकी सब हाल बता जाती है।
अपने हिस्से की नींद गँवाकर वो
सबके सपनों को सजाती है।
खुद टूटे भले ही अंदर से,
फिर भी खिलखिलाती है।
बेटे अक्सर घर संभालने में व्यस्त होते
बेटियाँ रिश्ते संभाल जाती हैं।
दीवारें तो हर कोई बना ले मगर,
बेटियाँ तो घर बनाना जानती हैं।
वो चूल्हे की आँच भी सहती है,
ऑफिस की दौड़ भी करती है।
कभी थक जाए पल दो पल को,
फिर भी “मैं ठीक हूँ” कहती है।
उसके भावों सा भाव कहाँ,
उसके प्रेम का तोल कहाँ।
जो खुद बिखर के घर जोड़े,
उस बेटी का कोई मोल कहाँ।
ना सोने-चाँदी की चाह उसे होती है
ना ऊँचे महलों के ख्वाब हैं।
बस अपने लोग सलामत रहें,
यही होता है उसका अपना सपना है
फिर क्यों उसकी उड़ान रोकी जाती,
क्यों सपनों पे पहरे लगाए जाते।
जो दो घरों में प्रेम जगाती,
उसे क्यों पराया बताया जाता!
बेटी तो ईश्वर का वो उपहार है,
जिससे महकता हर परिवार।
जिस घर उसकी इज़्ज़त होती,
वहीं बसता सच्चा संसार है।
