नर नहीं मैं नारी हूँ
नर नहीं मैं नारी हूँ
नर नहीं मैं नारी हूँ
कब कहाँ कि तुमसे भारी हूँ,
अर्द्धनारीश्वर स्वरूप है शिव का
उनकी मैं आभारी हूँ
नहीं बन सकती बार-बार मैं मीरा
अब गरलपान नहीं जरूरी है
क्यों दु नित्य अग्निपरीक्षा ?
पुरुषार्थ की भी मर्यादा जरूरी है
बहुत हुआ संघर्ष नारी का
नर की भी शुद्धि जरूरी है
वासना त्यागे,त्यागे मलीन विचार
तब कहीं खिलेगा धरा पर
अर्द्धस्वरूप का आकार।
