हर वर्ष दिवाली आती है
हर वर्ष दिवाली आती है
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
कहीं दिखता उजाला तो कहीं दिखता अंधेरा क्या यह अत्याचार नहीं,
दीप जले उनके घर भी क्या उनको इतना भी अधिकार नहीं,
उनके घर क्या कैसी दिवाली जो रोटी को बिलखते हैं,
मजदूरी कर बचपन से ही अभावों में पनपते हैं,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
हर वर्ष लक्ष्मी पूजन होता फिर दरिद्रता क्यों नहीं जाती है,
मंदिरों में पूजा करने वालों के अंदर कलुष क्यों भर जाता है,
छल प्रपंच की चादर ओढ़ करता है दिखावा,
लंका का रावण तो मर गया,
अपने मन के अंदर के रावण को क्यों नहीं मार पाता है,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
जीवन की सत्य कहानी में सपनों की गाथाएँ क्यों,
अहंकार जब तक है तब तक दिवाली कहाँ सजती है,
कहीं पकवानों की खुशबू आती कहीं चूल्हा भी नहीं चलता है,
सज जाते अनगिनत दीपों और लड़ियों की माला ,
पर कुछ घरों में दीप भी नहीं जलता है,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
इस अवसर पर दूर हो जाता घना अंधियारा,
युग - युग के तारक दीपों में दूर कहीं क्रंदन गीत सुनाई देता है,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी प्रपंच का डेरा है,
दिन के उजाले में भी कब होता उनका सवेरा है,
जब सबके मन में एक बसा क्यों ईश्वर तेरा और मेरा है,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
घर बाहर को साफ सफाई से चमका देते हम,
पर फिर भी दिल और दिमाग पर क्यों मकड़ी का जाला है,
क्यों कुटी अटारी के नीचे पूंजी और गरीबी का भेद है,
कहते हर वर्ष बुराई पर अच्छाई की जीत हुई,
पर अपने मन के लालच का कलुष कहाँ मिट पाता है,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों,
राम राज्य स्थापित करने का संदेश दिवाली देती है,
मन को आलोकित कर दीप के उजाले में हर अंधेरे को हर लेती हैं,
इस त्यौहार में उनके जीवन में भी मिठास घोल दो,
जिनके घर में एक दीप भी नहीं जलता है,
दीप जले हर घर में तो खुशियाँ दुगनी हो जाती है फिर ना कहे कोई,
हर वर्ष दिवाली आती है फिर भी व्यापक रयन अंधेरा क्यों।
