"निराशा के बादल घने"
"निराशा के बादल घने"
जब घेर ले,निराशा के बादल घने
नजर न आये,तुझे कोई रास्ते नये
तब रोने से बेहतर,लड़ इस कदर
आंखों में तेरे कहीं नही दिखे डर
तब भीतर अभिमन्यु से सीख ले,
कैसे होते कभी कोई तम उजले
जब घेर ले,निराशा के बादल घने
तब तू जलाना दीपक सँघर्ष तले
यहां पर तेरी जीत चाहे हो न हो,
कर्म ऐसे हो,जिससे सबके हो भले
जब फैला अमावस का तब घना
तब बनना तू पूर्णिमा का चंद्र घने
जब घेर ले,निराशा के बादल घने
तब गीत गाना,तू अपनी मस्ती के
हर मर्ज की होती दुनिया मे दवा है,
पर भीरू की न होती दवा-दुआ है,
गम-दरिया में वो लाते मोती हंसते
जिनकी आंखों में होते सच्चे सपने
साधनों से कभी मंजिल न मिलती,
खुद के पैरों से ही मंजिल मिलती,
तकदीर उनकी भी है,हाथ न जिनके
जब घेर ले,निराशा के बादल घने
तब धैर्य से चमका भाग्य को अपने
हर रात के बाद भोर अवश्य होती है,
चाहे अंधेरे में पीछे छिपे गम कितने
तू चलता चल,अपनी धुन में साखी,
देखते निराशापल जीवन मे है,कितने
अदम्य साहस से टूटते गिरी,कितने
जब घेर ले,निराशा के बादल घने
तब जला सकारात्मक दीप उतने।
