निंदा (कुंडलियां)
निंदा (कुंडलियां)
निंदा रस में लीन हैं, जाने माने लोग।
भोग रहे हैं हम सभी,अपना अपना भोग।।
अपना अपना भोग, सभी जीवन हैं जीते।
सुख- दुख का है योग,जहर जीवन का पीते।।
जैसे राखें राम, सभी रहते हैं जिंदा।
सब में है गुण दोष, नहीं करनी है निंदा।।
