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Kumar Vikash

Romance

4.4  

Kumar Vikash

Romance

नींद और ख्व़ाब के दरमियान

नींद और ख्व़ाब के दरमियान

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नींद और ख्व़ाब के दरमियान ,

जीवन मानो जैसे

रूक सा जाता है !

जाने क्यों ऐ तन्हाई मुझे अब ,

तेरा ये आलम

बहुत भाता है !

दिन के शोरगुल से ये जिन्दगी ,

मुझे अब बोझल

सी लगने लगी है !

क्योंकि मेरा एक तुझसे मिलना ,

अब इस नींद और ख्व़ाब

के दरमियान ही हो पाता है !!


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