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मिली साहा

Abstract

4.6  

मिली साहा

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नारी

नारी

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752


ईश्वर ने नारी को बनाया है कुछ अलग ही मिट्टी से

जैसा मिलता परिवेश उसको उसी में ढल जाती है


पर कमजोर ना समझना शक्ति का भंडार है नारी

जीवनदायिनी कहलाती सृष्टि का आधार है नारी


हर रिश्ते की ताकत नारी इस जग की पहचान है

मां बहन पत्नी बेटी रूप में वो हर घर की शान है


कैसी भी हो परिस्थिति कभी नहीं डिगती है नारी

हर मुश्किलों से जीतने का हौसला रखती है नारी


जीवन की हर चुनौती से खुद निपटना जानती है

फिर भी रीति-रिवाजों से जीवन भर वो लड़ती है


हर रूप में अपना किरदार पूरे मन से निभाती है

अपने ग़म और दर्द को नारी सीने में छुपा लेती है


दया प्यार करुणा और त्याग की मूरत कहलाती है

अपनी भावनाओं को छोड़ अपनों के लिए जीती है


तवे पे रोटी के समान नारी हर रोज सेकी जाती है 

शब्दों के खंजर से रोज़ कितनी बार भेदी जाती है


घर से लेकर दफ्तर तक सब कुछ संभाल लेती है

फिर भी कुछ ना करने का ताना हर दम सुनती है


घर में रहकर वो अपने घर को सजाती संवारती है

हिम्मत की मिसाल नारी आसमान छूना जानती है


अपने बच्चों के साथ सदा दोस्त बनकर खेलती है

सबके पसंद का स्वादिष्ट खाना भी रोज़ बनाती है


पढ़ाती है अपने बच्चों को सही मार्ग दिखलाती है

फिर भी ना जाने क्यों नारी नासमझ कहलाती है


लक्ष्मी कहलाती घर की देवी रुप में पूजी जाती है

फिर क्यों दहेज के लिए नारी बलि चढ़ाई जाती है


गलत ना होने पर भी सदा गलत ठहराई जाती है

यही है नारी जो अपनों के लिए सब सह जाती है


अपने परिवार को एक डोर में बांधे रखती है नारी

दुनिया के हर जुल्म को हँसकर सह जाती है ‌नारी 


प्यार और संस्कारों से घर को स्वर्ग बनाती है नारी

पूरा जीवन रिश्तों के लिए क़ुर्बान कर देती है नारी


नारी शक्ति है नारी से ही उत्पत्ति है और है निर्माण

नारी से ही ये जगत है और है इस जग की पहचान



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